मंगलवार, 25 नवंबर 2014

= “पं. विं. त.” ५/६ =

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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“पञ्चविंशति तरंग” ५/६)*
पालकि छाप धरी गुरु मन्दिर, 
सव्य बनाय सुभांति सजाई ।
जो अपनो गुरुपंथ उपासक, 
पास रखे गुरुवाणि पुजाई ॥ 
दास - गरीब दई सबको सुध, 
संत सुधानहिं वाणि धराई ।
देश दिशा निज साधुन को पठि, 
माधव वाणिजु कीरति गाई ॥५॥ 
श्रीगुरुवाणी - विराजित सौंज को ‘‘श्रीदादू पालकी’’ - संज्ञा से संघोशित किया जाने लगा । श्रद्धा प्रीति से उसे बहुत अच्छी तरह सजाया जाता । पंथ उपासक सभी संत अपने पास भी श्रीदादू वाणी की हस्तलिखित प्रतिलिपि रखने लगे । गरीबदासजी ने विभिन्न दिशाओं में साधुओं को भेजकर गुरुवाणी की स्थापना करवाई, पूजा पद्धति के लिये निर्देश दिये । माधवदास कहते हैं कि - सर्वत्र गुरुवाणी की कीर्ति गाई जाने लगी ॥५॥ 
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*शब्दों को तालमात्राओं के अनुसार गरीबदास जी ने किया ~*
*छन्द*
दादु गुरु निज आयसु पावत, 
रज्जब मोहन श्री जगन्नाथा ।
साखि हु शोध अनुक्रम राखत, 
ताल रु राग गरीबहिं साथा ॥ 
अंग सैंतीसहिं साखि लिखी सब, 
राग सताइस शब्दहिं गाथा ।
यों करि संत लिखी गुरु वाणिजु, 
स्थान रु स्थान भई विख्याता ॥६॥ 
इस गुरुवाणी का सम्पादन श्रीदादूजी की आज्ञा लेकर श्रीरज्जबजी मोहनजी, जगन्नाथजी तथा गरीबदासजी ने किया था । प्रसंगानुसार शोध - शोध कर अनुक्रम से सैंतीस अंगों में साखियों को रखा गया था । भजन - पद्यों की २७ रागों में, तालानुसार निबद्ध करके गरीबदासजी ने सु नियोजित किया ॥६॥
(क्रमशः)

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