मंगलवार, 25 नवंबर 2014

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द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध) राग गौड़ी १(गायन समय दिन ३ से ६)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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५९. त्रिताल ~
मन मतवाला मधु पीवै, 
पीवै बारम्बारो रे ।
हरि रस रातो राम के, 
सदा रहै इकतारो रे ॥टेक॥
भाव भक्ति भाठी भई, 
काया कसणी सारो रे ।
पोता मेरे प्रेम का, 
सदा अखंडित धारो रे ॥१॥
ब्रह्म अग्नि जौबन जरै, 
चेतन चितहि उजासो रे ।
सुमति कलाली सारवै, 
कोई पीवै विरला दासो रे ॥२॥
प्रीति पियाले पीवही, 
छिन - छिन बारंबारो रे ।
आपा धन सब सौंपिया, 
तब रस पाया सारो रे ॥३॥
आपा पर नहिं जाणिये, 
भूलो माया जालो रे ।
दादू हरि रस जे पिवै, 
ताको कदे न लागै कालो रे ॥४॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव मद्य के रूप से राम - भक्ति रूप रस का परिचय दे रहे हैं कि हे भाई हमारा मन तो अब परब्रह्म का साक्षात्कार रूप मद्य - रस का पान करता है और मतवाला रहता है । और पुनः पुनः पान करता हुआ, इन सम्पूर्ण पापों को और तापों को हरने वाले इस राम - रस में सदा दत्तचित्त रहता है ।
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अब इस राम - रस रूपी मद्य को बनाने की विधि बताते हैं । श्रद्धा रूप भूमिका पर भक्ति रूप भट्टी बनावे । निर्दोष शरीर रूप पात्र को, रस निकालने के लिए भट्टी पर रखा गया है और ...
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ब्रह्मज्ञान रूपी उस भट्टी में अग्नि जलती है और युवावस्था के विकार रूप जलाने का ईंधन है । चित्त में निरन्तर चैतन्य स्वरूप आत्मा का चिंतन होना ही अग्नि का प्रकाश है और सुबुद्धि कहिए सुन्दर बुद्धि ही कलाली है और उसके हेत रूप हाथ में आत्म - प्रीति रूप ही मानो गीला कपड़ा है । उसको शरीर रूप पात्र पर घुमाने से फिर राम - रस रूपी मद्य निकलता है । इस क्रम से, वह सदा अखंड धारा रूप से राम - रस रूप मद्य निकलता रहता है । अब आगे राम - रस मद्य पीने वाले पुरुषों का परिचय दे रहे हैं ।
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इस प्रकार से जो राम - रस रूप मद्य निकलता है, उसको पीने वाले अनन्य ईश्‍वर के भक्त प्रीति रूप प्याले से बारम्बार पान करते रहते हैं । फिर उन्होंने मतवाले होकर अपने पराये का भेद कुछ भी न समझकर तथा सम्पूर्ण मायिक संसार - जाल को अन्तःकरण से भूलकर, अपना सम्पूर्ण अनात्म - अहंकार रूप धन, प्रभु को समर्पण किया है ।
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उन्हीं संतों को यह राम - रस रूप मद्य - रस प्राप्त हुआ है । इस प्रकार से निकाले हुए हरि - रस का जो पान करते है, वे परब्रह्म के स्वरूप में ही समा जाते हैं । फिर उन पर काल का जोर नहीं चलता ।
(क्रमशः)

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