मंगलवार, 25 नवंबर 2014

*पालड़ी प्रसंग से आगे*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*पालड़ी प्रसंग से आगे*
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२०३. शब्द बाण । त्रिताल
संतों ! राम बाण मोहि लागे ।
मारत मृग मर्म तब पायो, सब संगी मिल जागे ॥टेक॥
चित चेतन चिंतामणि चीन्हा, उलट अपूठा आया ।
मंदिर पैसि बहुरि नहिं निकसै, परम तत्त घर पाया ॥१॥
आवै न जाइ, जाइ नहिं आवै, तिहिं रस मनवा माता ।
पान करत परमानन्द पायो, थकित भयो चलि जाता ॥२॥
भयो अपंग पंक नहि लागै, निर्मल संग सहाई ।
पूर्ण ब्रह्म अखिल अविनाशी, तिहिं तज अनत न जाई ॥३॥
सो शर लागि प्रेम प्रकाशा, प्रकटी प्रीतम वाणी ।
दादू दीन दयाल ही जानै, सुख में सुरति समानी ॥४॥
पालड़ी में एक दिन संत सभा में कु़छ संतों ने दादूजी से पू़छा- आपकी यह परम उच्च स्थिति कैसे हुई थी ? हमें भी बाताइये । तब दादूजी ने २०३ का पद सुनाकर उनके प्रश्‍न का उत्तर दिया था ।
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१८५. काल चेतावनी । भंगताल
साथी ! सावधान ह्वै रहिये ।
पलक मांहि परमेश्वर जाणै, कहा होइ कहा कहिये ॥टेक॥
बाबा, बाट घाट कुछ समझ न आवै, दूर गवन हम जाना ।
परदेशी पंथी चलै अकेला, औघट घाट पयाना ॥१॥
बाबा, संग न साथी कोई नहीं तेरा, यहु सब हाट पसारा ।
तरवर पंखी सबै सिधाये, तेरा कौण गँवारा ॥२॥
बाबा, सबै बटाऊ पंथ सिरानैं, सुस्थिर नांहीं कोई ।
अंति काल को आगे पीछे, बिछुरत बार न होई ॥३॥
बाबा, काची काया कौण भरोसा, रैन गई क्या सोवे ।
दादू संबल सुकृत लीजे, सावधान किन होवे ॥४॥
पालड़ी में एक दिन एक वृद्ध पुरुष ने दादूजी से प्रश्‍न किया- स्वामिन् ! मुझे क्या करना चाहिये । तब दादूजी ने उसे उक्त १५४ के पद से उपदेश किया था । उक्त उपदेश सुनकर उस वृद्ध ने कहा- अब मैं सदा आपके कथानुसार ही करता रहूँगा ।
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७५.पराभक्ति प्रार्थना । कहरवा
रमैया ! यहु दुख सालै मोहि ।
सेज सुहाग न प्रीति प्रेम रस, दर्शन नांहीं तोहि ॥टेक॥
अंग प्रसंग एक रस नांही, सदा समीप न पावै ।
ज्यों रस में रस बहुरि न निकसै, ऐसैं होइ न आवै ॥१॥
आत्मलीन नहीं निशिवासर, भक्ति अखंडित सेवा ।
सन्मुख सदा परस्पर नाहीं, तातैं दुख मोहि देवा ॥२॥
मगन गलित महारस माता, तूँ है तब लग पीजै ।
दादू जब लग अंत न आवै, तब लग देखन दीजै ॥३॥
खोजीजी ने पू़छा- पराभक्ति प्राप्त करने के लिये प्रार्थना किस प्रकार करनी चाहिये ? तब दादूजी ने उक्त ७५ के पद से उत्तर दिया था । 
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फिर खोजीजी ने पू़छा- पराभक्ति का स्वरूप भी बताइये । तब दादूजी ने ४०७ के पद -
४०७. पराभक्ति । त्रिताल
राम तूँ मोरा हौं तोरा, पाइन परत निहोरा ॥टेक॥
एकै संगैं वासा, तुम ठाकुर हम दासा ॥१॥
तन मन तुम कौं देबा, तेज पुंज हम लेबा ॥२॥
रस माँही रस होइबा, ज्योति स्वरूपी जोइबा ॥३॥
ब्रह्म जीव का मेला, दादू नूर अकेला ॥४॥
से पराभक्ति का स्वरूप खोजीजी को बताया था ।

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