रविवार, 16 नवंबर 2014

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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन* द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध)
राग गौड़ी १(गायन समय दिन ३ से ६)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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५०. तत्व उपदेश । राज मृगांक ताल ~
तूँ है तूँ है तूँ है तेरा, 
मैं नहीं मैं नहीं मैं नहीं मेरा ॥टेक॥
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तूँ है तेरा जगत उपाया, 
मैं मैं मेरा धंधै लाया ॥१॥
तूँ है तेरा खेल पसारा, 
मैं मैं मेरा कहै गँवारा ॥२॥
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तूँ है तेरा सब संसारा, 
मैं मैं मेरा तिन सिर भारा ॥३॥
तूँ है तेरा काल न खाइ, 
मैं मैं मेरा मर मर जाइ ॥४॥
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तूँ है तेरा रह्या समाइ, 
मैं मैं मेरा गया विलाइ ॥५॥
तूँ है तेरा तुम्हीं मांहिं, 
मैं मैं मेरा मैं कुछ नांहिं ॥६॥
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तूँ है तेरा तूँ ही होइ, 
मैं मैं मेरा मिल्या न कोइ ॥७॥
तूँ है तेरा लंघे पार, 
दादू पाया ज्ञान विचार ॥८॥
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टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव तत्व - ज्ञान का उपदेश कर रहे हैं कि हे परमेश्‍वर ! आप सत् चित् आनन्द स्वरूप हैं, और यह सब कुछ रचना आपकी ही रची हुई है । और जो अज्ञानी मनुष्य कहते हैं कि मैं हूँ और मेरा है, वह सब मिथ्या है । अर्थात् न मैं हूँ और न मेरा है । मन - वचन कर्म से मुक्त जन कहते हैं कि सब कुछ आप ही हो और यह सब आप ही की रचना है ।
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आपका ही यह जगत उत्पन्न किया हुआ है । जो कहता है मैं हूँ और मेरा है, उसको आपने जन्म - मरण के काम में लगा दिया है । परन्तु संतजन कहते हैं कि आप ही हो और सारा पसारा आप का ही किया हुआ है और इस पसारे में आप ही खेलते हो । जो कहते हैं, मैं हूँ, मैं हूँ, वे विषय में आसक्त गँवार, अज्ञानी हैं ।
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आप ही हो और यह सारा संसार आपका है और जो कहते हैं, मैं हूँ और मेरा है, उनके मस्तक पर मिथ्या ही अहंकार रूपी पाप का भार रखा है । और जो कहते हैं परमेश्‍वर तूँ है और तेरा है, उनको काल - भक्षण नहीं करता है । जो कहते हैं, “मैं हूँ, मैं हूँ,” मेरा है, वह पुनः पुनः संसार में जन्मते मरते हैं ।
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जो कहते हैं, तूँ है सब कुछ तेरा है, वे सब आप में ही समा कर रहते हैं । और जो कहते हैं, मैं हूँ मेरा है, वे सभी नष्ट हो गये हैं । जो कहते हैं, तूँ है और तेरा है, वह आपके अन्दर ही निवास करते हैं और जो कहते हैं, मैं हूँ मेरा है, वे अज्ञानी वास्तव में कुछ भी नहीं हैं ।
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और जो कहते हैं, तूँ है और सब कुछ तेरा है, वे तुम्हारा ही रूप हो जाते हैं । जो कहते हैं, मैं हूँ, और मेरा है, वे कभी भीं आपको नहीं मिले और न मिलेंगे । जो कहते हैं, तूँ है, तेरा है, वे ही संसार को पार कर जाते हैं । इस प्रकार तत्ववेत्ता पुरुष कहते हैं कि हमने तो विचार रूप ज्ञान के द्वारा ही परमेश्‍वर को प्राप्त किया है ।
(क्रमशः)

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