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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन* द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध)
राग गौड़ी १(गायन समय दिन ३ से ६)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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५२. पंचम ताल ~
निकटि निरंजन लाग रहे,
तब हम जीवित मुक्त भये ॥टेक॥
मर कर मुक्ति जहाँ जग जाइ,
तहाँ न मेरा न पतियाइ ॥१॥
आगे जन्म लहैं अवतारा,
तहाँ न मानै मना हमारा ॥२॥
तन छूटे गति जो पद होइ,
मृतक जीव मिले सब कोइ ॥३॥
जीवित जन्म सुफल करि जाना,
दादू राम मिले मन माना ॥४॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव कहते हैं कि हम तो हृदय प्रदेश में जो निरंजन निराकार रूप राम है, उसी में नाम - स्मरण द्वारा स्थिर हो रहे हैं, इस प्रकार हम जीते ही मुक्त हो गए हैं ।
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शरीर छोड़कर जिस मुक्ति - धाम में जगत के प्राणी जाते हैं, उस मुक्तिधाम में हमारा मन विश्वास नहीं करता है ।
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क्योंकि वहाँ से तो फिर वापिस संसार में आकर जन्म लेते हैं । उस सिद्धान्त से हमारे मन को संतोष नहीं है ।
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जो शरीर छूटने के बाद ब्रह्म प्राप्ति रूप सद्गति को प्राप्त होते हैं, तो फिर सम्पूर्ण प्राणीमात्र शरीर त्यागने के बाद ब्रह्म को प्राप्त होने चाहिये ।
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इसलिये जीवित अवस्था में ही जिसने स्वस्वरूप को प्राप्त कर लिया, उसी ने अभीष्ट अपने जन्म को सार्थक बना लिया हैं, राम में मिलकर ।
(क्रमशः)

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