मंगलवार, 18 नवंबर 2014

= १९० =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
विष अमृत घट में बसै, विरला जानै कोइ । 
जिन विष खाया ते मुये, अमर अमी सौं होइ ॥ 
दादू सब ही मर रहे, जीवे नांही कोइ । 
सोई कहिये जीवता, जे कलि अजरावर होइ ॥ 
देह रहै संसार में, जीव राम के पास । 
दादू कुछ व्यापै नहीं, काल झाल दुख त्रास ॥ 
काया की संगति तजै, बैठा हरि पद मांहि । 
दादू निर्भय ह्वै रहै, कोई गुण व्यापै नांहि ॥ 
दादू तज संसार सब, रहे निराला होइ । 
अविनाशी के आसरे, काल न लागे कोइ ॥ 
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साभार : नितिन सिंह ~ 
कर्मफल से मुक्ति नहीं मिलने की दशा में बार-बार शरीर ग्रहण करना पड़ता है। जब तक जीव अपने संग्रहीत कर्म फलों से रिक्त नहीं होता तब तक वह आत्म चिंतन की बात सोच भी नहीं सकता। पर कर्मफलों का बंधन कब खत्म होता है। ज्ञानी कहते हैं कि ऐसा तभी संभव है जब अहंकार खत्म हो जाए। 
जब मानव के अहंकार का भाव मिट जाता है तब वह तत्व दर्शन का अधिकारी बन जाता है। अन्यथा मनुष्य कितने भी प्रयत्न कर ले, वह तत्व का दर्शन नहीं कर सकता है। चाहे जितना दान, पुण्य, सेवा, तपस्या करे, वेदांत का महान विद्वान बन जाए तो भी तत्व का दर्शन अहंकार का त्याग किए बिना संभव नहीं है। दान, पुण्य, सेवा आदि जितने भी कर्म हैं वे सारे के सारे अहंकार को मिटाने में सहायक तो हैं लेकिन तत्वदर्शी बनाने के साधन नहीं हैं। 
जितने भी कर्म हैं वे सब गुणों से प्रेरित होकर किए जाते हैं। सत्वगुण की प्रधानता होने पर मानव ज्ञान की बातों में रुचि लेते हुए सत्य की खोज की तरफ बढ़ने की कोशिश करता है। रजोगुण की प्रधानता होने पर मानव के मन में संसार की विभिन्न प्रकार की भोग्य वस्तुओं का संग्रह करने की इच्छा बलवती होती जाती है और संग्रह किए गए पदार्थों को अपनी ही स्वार्थपूर्ति के लिए सुरक्षित बनाए रखने की प्रबल इच्छा से प्रवृत्त होकर वह कर्म करता है। तमोगुण की प्रधानता होने पर मानव प्रमाद में आ जाता है, वह आलसी हो जाता है। अज्ञान और मोह में फंस कर मानव अंधकार में पड़े हुए पशु जैसा जीवन व्यतीत करता है। 
सत्वगुण मानव को ऊपर की ओर उठाता है तो रजोगुण के मध्य में ही फंसाए रखता है और तमोगुण मानव को अधोमुखी बना देता है। इन तीन प्रकार की वृत्तियों द्वारा माया अपना जाल फैलाते हुए संसार की रचना करती है। इसलिए उपनिषद् के ऋषि ने कहा है कि उस अविनाशी आत्मा को जानने का यत्न प्रत्येक मानव को करना चाहिए। क्योंकि वह (अर्थात आत्मा) न तो कहीं जाता है और न कहीं से आता है। वह तो सर्वव्यापी है। सबका भरण पोषण करने वाला है। 
जब मानव इस आत्म तत्व को अपने पूर्व कर्मों के प्रभाव से देखने का यत्न करता है तो उसके भीतर धीरे-धीरे ज्ञान का प्रकाश फैलने लगता है और वह संसार के गोपनीय तत्व को जानने लगता है। इस प्रकार जब मानव उस तत्व की ओर अग्रसर होता है तो उसके अहंकार की फांस ढीली पड़ने लगती है। जैसे-जैसे अहं कम होता जाता है वैसे वैसे माया का अंधकार रूपी आवरण भी हल्का होता जाता है। तब उस आत्म तत्व के प्रकाश की झलक स्पष्ट होने लगती है। 
इसलिए श्रीकृष्ण ने अर्जुन को रणभूमि में समझाया था कि यह आत्म तत्व तो अजन्मा, नित्य, शाश्वत और सनातन है। केवल शरीर ही मरणधर्मा है। इसलिए तुम उस अविनाशी को जानने का यत्न करो जिसे जान लेने के बाद जानने लायक कुछ भी शेष नहीं रहता। पर इसके लिए अहंकार भाव छोड़ना पड़ेगा। तभी बुद्धि आत्म तत्व के इस रूप का साक्षात्कार कर सकेगी और सांसारिक प्रपंच से निर्लिप्त हो सकेगी। 
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कर्मफल से मुक्ति नहीं मिलने की दशा में बार-बार शरीर ग्रहण करना पड़ता है। जब तक जीव अपने संग्रहीत कर्म फलों से रिक्त नहीं होता तब तक वह आत्म चिंतन की बात सोच भी नहीं सकता। पर कर्मफलों का बंधन कब खत्म होता है। ज्ञानी कहते हैं कि ऐसा तभी संभव है जब अहंकार खत्म हो जाए। 
जब मानव के अहंकार का भाव मिट जाता है तब वह तत्व दर्शन का अधिकारी बन जाता है। अन्यथा मनुष्य कितने भी प्रयत्न कर ले, वह तत्व का दर्शन नहीं कर सकता है। चाहे जितना दान, पुण्य, सेवा, तपस्या करे, वेदांत का महान विद्वान बन जाए तो भी तत्व का दर्शन अहंकार का त्याग किए बिना संभव नहीं है। दान, पुण्य, सेवा आदि जितने भी कर्म हैं वे सारे के सारे अहंकार को मिटाने में सहायक तो हैं लेकिन तत्वदर्शी बनाने के साधन नहीं हैं। 
जितने भी कर्म हैं वे सब गुणों से प्रेरित होकर किए जाते हैं। सत्वगुण की प्रधानता होने पर मानव ज्ञान की बातों में रुचि लेते हुए सत्य की खोज की तरफ बढ़ने की कोशिश करता है। रजोगुण की प्रधानता होने पर मानव के मन में संसार की विभिन्न प्रकार की भोग्य वस्तुओं का संग्रह करने की इच्छा बलवती होती जाती है और संग्रह किए गए पदार्थों को अपनी ही स्वार्थपूर्ति के लिए सुरक्षित बनाए रखने की प्रबल इच्छा से प्रवृत्त होकर वह कर्म करता है। तमोगुण की प्रधानता होने पर मानव प्रमाद में आ जाता है, वह आलसी हो जाता है। अज्ञान और मोह में फंस कर मानव अंधकार में पड़े हुए पशु जैसा जीवन व्यतीत करता है। 
सत्वगुण मानव को ऊपर की ओर उठाता है तो रजोगुण के मध्य में ही फंसाए रखता है और तमोगुण मानव को अधोमुखी बना देता है। इन तीन प्रकार की वृत्तियों द्वारा माया अपना जाल फैलाते हुए संसार की रचना करती है। इसलिए उपनिषद् के ऋषि ने कहा है कि उस अविनाशी आत्मा को जानने का यत्न प्रत्येक मानव को करना चाहिए। क्योंकि वह (अर्थात आत्मा) न तो कहीं जाता है और न कहीं से आता है। वह तो सर्वव्यापी है। सबका भरण पोषण करने वाला है। 
जब मानव इस आत्म तत्व को अपने पूर्व कर्मों के प्रभाव से देखने का यत्न करता है तो उसके भीतर धीरे-धीरे ज्ञान का प्रकाश फैलने लगता है और वह संसार के गोपनीय तत्व को जानने लगता है। इस प्रकार जब मानव उस तत्व की ओर अग्रसर होता है तो उसके अहंकार की फांस ढीली पड़ने लगती है। जैसे-जैसे अहं कम होता जाता है वैसे वैसे माया का अंधकार रूपी आवरण भी हल्का होता जाता है। तब उस आत्म तत्व के प्रकाश की झलक स्पष्ट होने लगती है। 
इसलिए श्रीकृष्ण ने अर्जुन को रणभूमि में समझाया था कि यह आत्म तत्व तो अजन्मा, नित्य, शाश्वत और सनातन है। केवल शरीर ही मरणधर्मा है। इसलिए तुम उस अविनाशी को जानने का यत्न करो जिसे जान लेने के बाद जानने लायक कुछ भी शेष नहीं रहता। पर इसके लिए अहंकार भाव छोड़ना पड़ेगा। तभी बुद्धि आत्म तत्व के इस रूप का साक्षात्कार कर सकेगी और सांसारिक प्रपंच से निर्लिप्त हो सकेगी।

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