मंगलवार, 18 नवंबर 2014

१४. बचन बिवेक को अंग ~ १


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॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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१४. बचन बिवेक को अंग
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*जाकै घर ताजी तुरकीन कौ तबेला बंध्यौ,*
*ताकैं आगै फेरि फेरि टटुवा नचाइये ॥*
*जाकै खासा मल मल सिरी साफ ढेर परे,*
*ताकै आगै आंनि करि चौसाई नाखाइये ॥*
*जाकौं पंचामृत खात खात सब दिन बीते,*
*सुन्दर कहत ताहि राबरी चखाइये ॥*
*चतुर प्रबीन आगै मूरख उचार करै,*
*सूरज कै आगै जेसैं जैंगना दिखाइये ॥१॥*
जिसको अश्वशाला में ताजिकिस्तान एवं तुर्किस्तान के एक से एक बलिष्ठ एवं वेगवान् घोड़े बन्धे हों, उसके आगे कोई अपने निम्न स्तर के घोड़े(टटू) को बार बार घुमावे ।
या जिसे मँहगे, मलमल के वस्त्रों की राशि अपने सामने रखी हो, उसके सम्मुख चौसे(साधारण रुई) का कोई वस्त्र रख दिया जाय ।
या जो दिन रात पंचामृत पक्वान्न(मिठाई) खा खा कर अपना समय बिताता हो, उसके सामने खाने के लिये जौ की बनी हुई राबड़ी रख दी जाय ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - इसी तरह किसी चतुर प्रवीण कलाकार के सामने कोई मूर्ख गर्दभस्वर से कुछ उच्चारण करने लगे तो यह वैसी ही बात होगी जैसे कोई सूर्य के सम्मुख जुगनूँ(कीट) का प्रकाश दिखा रहा हो ॥१॥
(क्रमशः)

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