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*श्री सन्त-गुण-सागरामृत श्री दादूराम कथा अतिपावन गंगा* ~
स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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*(“चतुर्विंशति तरंग” ९/१०)*
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संत सम्मान कियो बड़ साधुन,
सेवक साधन सम्मुख कीन्हे ।
चौदह संत सुसेवन चौकस,
स्वागत लेन पठे मसकीने ।
जस्सहु सांग प्रयाग दमोदर,
खेम दयाल रु पीप हिं चीन्हे ।
विष्णु जु बोहित चेतन साधुहि,
ये दश एक सबै सुध लीन्हे ॥९॥
श्री दादूजी के शिष्य संतों ने समागत विशिष्ट साधुओं का अतीव आदरपूर्वक स्वागत किया । मसकीन दासजी की अगवानी में चौदह संत, सभी समागत साधुओं का स्वागत करने, ठहराने, भोजन पानादि की व्यवस्था में जुटे हुये थे । जस्साराम, सांगाराम, प्रयागदास, दामोदर, खेमाराम, दयालदास, पीपाराम, विष्णुदास, बोहितदास, चेतनदास, साधुराम ये गयारह संत घूम - घूमकर सभी डेरों में व्यवस्था सँभाल रहे थे ॥९॥
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*श्री दादूजी के सिद्धान्तों पर चलना*
छीतर गोविन्द रज्जब के शिष,
केशव ये सब पंथ भंडारी ।
साधुन के जल की सुध लेवत,
कोरहिं कुम्भ भरे शत वारी ।
रैन व्यतीत भई दिन आगत,
पूर्णिम सम्मेलन गुरु भारी ।
संत समाज अथाह जुड़े दल,
भोजन की बहु राशि तियारी ॥१०॥
छीतरदास, गोविन्ददास, रज्जबजी के शिष्य, केशवदास ये सब पंथ भंडारी भंडार व्यवस्था संभाल रहे थे । साधुओं के डेरों पर कोरे कुम्भों में जल भरवाया गया । एक - एक डेरे पर सौ - सौ कुम्भ जल के भरे गये । व्यवस्थाओं की देखरेख के साथ रात्रि व्यतीत हुई । सूर्योदय के साथ पूर्णिमा के दिन संत महोत्सव का आयोजन प्रारम्भ हुआ । अपार संत समाज सत्संग सभा में उपस्थित था । विशिष्ट साधु संतों ने श्री दादूजी के चरित्र, साधन पद्धति और महिमा पर व्याख्यान दिये । गुणगान और हरिकीर्तन के पश्चात् श्रीदादूजी के उपदेशों का जीवन में आचरण करने हेतु संकल्प लिया गया । तत्पश्चात् भोजन प्रसाद की तैयारी की गई ॥१०॥
(क्रमशः)

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