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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन* द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध)
राग गौड़ी १(गायन समय दिन ३ से ६)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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४६. हित उपदेश । नट ताल ~
हुसियार रहो, मन मारैगा,
साँई सतगुरु तारैगा ॥टेक॥
माया का सुख भावै,
मूरख मन बौरावै रे ॥१॥
झूठ साच कर जाना,
इन्द्रिय स्वाद भुलाना रे ॥२॥
दुख को सुख कर मानै,
काल झाल नहीं जानै रे ॥३॥
दादू कह समझावै,
यहु अवसर बहुरि न पावै रे ॥४॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव जीवों के हित के लिये उपदेश करते हैं कि हे साधक पुरुष ! मन से सावधान रहना, क्योंकि यह मन विषयों में प्रवृत्ति कराके, परमार्थ मार्ग से गिरा देता है ।
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और यदि कभी मन के वश होकर गिर भी जावे, तो तूँ फिर परमात्मा और सतगुरु की शरण में जाना, वही तेरा उद्धार करेंगे ।
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इस मन को मायावी नाना प्रकार के सांसारिक सुख प्रिय लगते हैं, यह उन्हीं में लगकर परमात्मा की तऱफ से विमुख हो रहा है और झूठे संसार को ही सत्य करके जाना है । इन्द्रियों के विषयों के स्वादों में लगकर परमात्मा को भूल रहा है ।
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दुःखरूप संसार को ही सुखरूप समझकर इसमें प्रसन्न रहता है । यह अज्ञानी जीव यह नहीं जानता कि यह तो सब उपरोक्त काल की ज्वाला हैं ।
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तत्ववेत्ता पुरुष कह कर समझाते हैं कि हे जीव ! यह मनुष्य जन्म रूपी अवसर, कहिये समय बारबार नहीं प्राप्त होगा ।
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लिख भेजी तुक दयाल जी, गरीबदास आमेर ।
उन गुरु की अगली लिखी, साँई सतगुरु महेर ॥४६॥
दृष्टान्त ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव आमेर में विराजते थे । उपरोक्त साखी की पंक्ति लिखकर जन गरीबदास जी के पास आंधी ग्राम में भेजी कि “हुसियार रहो मन मारेगा”, हे गरीबदास जी ! सचेत रहना मन से, इस मन ने बहुतों को श्रेय साधन से गिरा दिया हैं । तब गरीबदास जी ने अगली तुक लिख भेजी कि ~ “साँई सतगुरु तारेगा” कि हे गुरुदेव ! आप परमेश्वर स्वरूप हैं, आप ही महर करके संसार - सागर से तारोगे ।
(क्रमशः)

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