#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
दादू मेरा वैरी मैं मुवा, मुझे न मारै कोइ ।
मैं ही मुझको मारता, मैं मरजीवा होइ ॥
वैरी मारे मरि गये, चित तैं विसरे नांहि ।
दादू अजहूँ साल है, समझ देख मन मांहि ॥
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साभार : Gyan-Sarovar(ज्ञान-सरोवर)
चित्त की अशुद्धि के अनेक कारण होते हैं, और उसकी शुद्धि के उपाय भी अनेक हैं | उनमें से एक प्रधान कारण अभिमान भी है |
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अभिमान उसे कहते हैं, जिससे मनुष्य किसी प्रकार के गुण के साथ अपनी एकता करके अपने को दूसरों की अपेक्षा श्रेष्ठ मानने लगता है | इस अभिमान के कारण मनुष्य जिनमें उस गुण का अभाव या कमी देखता है, उनको तुच्छ समझकर उनसे घृणा करने लगता है और जिनमें अपने से अधिक देखता है, उनसे ईर्ष्या करने लगता है | इस प्रकार घृणा और ईर्ष्या के कारण उसका चित्त अशुद्ध हो जाता है |
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गुण के अभिमान से मनुष्य को अपने दोषों का दर्शन नहीं होता | अतः वह उनको हटा नहीं सकता | गुणों का अभिमान स्वयं ही एक बड़ा भारी दोष है | उसके रहते हुए दूसरे दोषों का नाश कैसे किया जा सके | सन्तो का कहना है कि अभिमानी योगी से पश्चात्ताप करनेवाला पापी अच्छा है; क्योंकि अच्छाई का अभिमान ही बुराई का मूल है |
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जो मनुष्य यह समझता है कि मैं सत्यवादी हूँ, उसमें कहीं-न-कहीं झूठ छिपा हुआ है | यदि वह सचमुच सत्यवादी हो तो उसे यह भास ही नहीं होना चाहिए कि मैं सत्यवादी हूँ | अपितु सत्य बोलना उसका जीवन बन जाना चाहिए | जो गुण साधक का जीवन बन जाता है उसमें साधक का अभिमान नहीं होता |
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वह उसके कारण अपने में किसी प्रकार कि विशेषता का अनुभव नहीं करता | जबतक किसी गुण का गुणबुद्धि से भास होता है, उसमें रस का अनुभव होता रहता है, तबतक मनुष्य में अनेक प्रकार के दोषों की उत्पत्ति होती रहती है, अतः गुण के अभिमान से चित्त अशुद्ध होता रहता है |

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