सोमवार, 24 नवंबर 2014

= २ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
ज्यों जाणों त्यों राखियो, तुम सिर डाली राइ । 
दूजा को देखूं नहीं, दादू अनत न जाइ ॥ 
ज्यों तुम भावै त्यों खुसी, हम राजी उस बात । 
दादू के दिल सिदक सौं, भावै दिन को रात ॥ 
दादू करणहार जे कुछ किया, सो बुरा न कहना जाइ । 
सोई सेवक संत जन, रहबा राम रजाइ ॥ 
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साभार : Rp Tripathi
*मकर संक्रांति पर, ऋषियों को हमारा क्रियात्मक योगदान :: एक लघु वैज्ञानिक प्रयोग* 

सर्व-प्रथम सभी मित्रों को, मकर-संक्रांति के पावन पर्व की, सपरिवार अनंत शुभ-कामनायें ..!! मित्रों, हमने विद्यालयों की प्रयोग-शालाओं में, भौतिक-विज्ञान के प्रयोग तो बहुत किए हैं, परन्तु आज, इस मकर-संक्रांति के पावन पर्व पर, एक छोटा सा, आध्यात्मिक-प्रयोग भी करते हैं, और अपने निष्कर्षों को, हमारे प्राचीन ऋषियों(आध्यात्मिक-वैज्ञानिकों) के, अनुभवों से मिलाते हैं ---- 

प्रयोग -- 
बहुत ही लघु ..., सिर्फ़, एक वाक्य ... "जो हुआ वह अच्छा हुआ" ... को बार बार दुहराना, जब तक कि हमें ... मनसा-वाचा-कर्मणा ... एक-रूपता .. की स्थिति प्राप्त ना हो जाए ..!! 

ऋषियों का निष्कर्ष :--- 
जिस अनुपात में हम, अपने भूतकाल से, .. मनसा-वाचा-कर्मणा .. मित्रता स्थापित करते जाते हैं, उसी ही अनुपात में हम, अशांति से शांति, अप्रसन्नता से प्रसन्नता, शिकायत से धन्यवाद, दुर्बलता से साहस, भय से निर्भयता और विवेक-हीनता से विवेक-शीलता में, स्थापित होते जाते हैं ..!! 

अर्थात, 
भूतकाल की किसी भी घटना के लिए, दूसरों और स्वयं को, किसी भी तरह के शिकायत(पश्चाताप) के भाव से मुक्त करते ही, ना सिर्फ़ हमारा वर्तमान सुखद हो जाता है, वरन्‌ हमारी कार्य करने और विवेक युक्त निर्णय लेने की क्षमता, के अपने उत्कर्ष पर पहुँच जाने से, हमारा भविश्य भी, सुखद हो जाता है ..!! अर्थात, आत्म-विश्वाश जाग्रत हो जाने से हम, भविश्य की चिंताओं से भी मुक्त हो जाते हैं ..!! 

दूसरे शब्दों में, सिर्फ़ भूत-काल से मित्रता करते ही हम -- भगवान कृष्ण की वाणी -- 
"जो हुआ वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है वह अच्छा हो रहा है(क्योंकि हम पूर्णतः शांत और विवेक से वर्तमान में कार्य कर रहे हैं), और जो होगा वह भी अच्छा ही होगा"(क्योंकि -- जब भूत और वर्तमान अच्छे हैं, तो भविश्य इनसे भिन्न हो ही नहीं सकता) में, स्थित हो जाते हैं ....!! 

और इसे ही प्रज्ञा-शक्ति का उदय होना कहते हैं, 
जिससे हमारे संपूर्ण क्रिया-कलाप, खुशी पाने के लिए नहीं, वरन आंतरिक-खुशी के साथ संपन्न होने लगते हैं ..!! 

हमारा निष्कर्ष ..? 

********ॐ कृष्णम वंदे जगत् गुरुम********

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