सोमवार, 24 नवंबर 2014

१४. बचन बिवेक को अंग ~ ७

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*१४. बचन बिवेक को अंग*
*प्रथम हिये बिचारि, ढीम सौ न दीजै डारि,*
*ताहि तैं सुबचन संभारि करि बोलिये ॥*
*जाने न कुहेत हेत भावै वैसी कहि देत,*
*कहिये तौ तब जन मन मांहि तौलिये ॥*
*सबही कौं लागै दुख कोऊ नहिं पावै सुख,*
*बोलिकैं बृथा ही नातें छाती नहीं छोलिये ॥*
*सुन्दर समुझि करि कहिये सरस बात,*
*तब ही तौ बदन कपाट गहि खोलिये ॥७॥*
*सोच समझ कै बोले वचन* : जो कुछ भी बोलना है उस पर पहले हृदय में विचार कर लें । ऐसा न हो कि आप बिना विचारे बोल कर किसी को ढेला मार दें । अतः पहले हृदय में विचार कर फिर सुवचन ही बोलना चाहिये ।
जो किसी का हित या अहित न देख कर जैसा चाहे वैसा बोल दे, उससे क्या लाभ होगा ! सत्य तो यह है की मन में विचार करके ही कुछ बोलना चाहिए ।
क्योंकि बिना विचारे बोला हुआ सभी के हृदय में कष्टप्रद हो जाता है, किसी को भी प्रिय नहीं लगता । उसे सुनाकर दूसरों को दुःख देने से का लाभ ! 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - अतः सोच समझ कर सरस(कर्णमधुर) शब्द ही बोलना चाहिये । ऐसा बोलना चाहने पर भी अपना मुख द्वार खोलना चाहिये - इसी में सब का हित है ॥७॥ 
(क्रमशः)

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