रविवार, 16 नवंबर 2014

= १८८ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐 
दादू "है" को भय घणां, नाहीं को कुछ नाहीं । 
दादू नाहीं होइ रहु, अपणे साहिब माहिं ॥ 
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सर्वज्ञ शङ्करेन्द्र ~ !! श्री भगवान् भाष्यकार चरणकमलेभ्यो नमो नमः !! 

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“धन्यता{कृत - कृत्यता} का बोध” {३} : 
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नारायण ! एक राजा था, नाम था उसका भीमसेन । उसका एक मन्त्री था जिसका नाम मतिसागर था। दोनों कहीं जा रहे थे । जब शिव की नगरी उज्जैन के पास से निकले तो देखते हैं कि एक बहुत बड़ा शहर है । दूर से देखा तो बड़े ही खुश हुए कि आज यहीं आराम करेंगे । 
लेकिन शहर में पहुँचे तो देखा कि शहर बिलकुल सूना पड़ा हुआ है । बड़ा आश्चर्य हुआ कि सारा शहर सूना कैसे पड़ा है ? थोड़ा आगे बढ़े तो एक बहुत भारी आलीशान महल था । उसके बगीचे में एक शेर एक आदमी को अपने पंजे में दबाकर धीरे - धीरे खा रहा था । 
भीमसेन जो राजा था उसने उस शेर को मारने और आदमी को बचाने के लिये झट से अपनी तलवार सम्भाली । वह शेर हँस पड़ा और बोला : "राजन् ! मैं कोई साधारण शेर नहीं हूँ जो मुझे आप तलवार से मार दोगे ! मैं तो राक्षस हूँ । इस शहर के सारे आदमीयों को मैंने खा लिया है । अब इस राजा को अंग - अंग करके खाना बाकी है । तू यहाँ से चला जा, यहाँ मत रह ।" 
राजा भीमसेन ने पूछा कि "बात क्या है, क्यों खा रहा है ?" शेर ने कहा : यह एक शहर है जिसका नाम हेमपुर है और जिसे मैं खा रहा हूँ, यह यहाँ का राजा है । इसका नाम हेमरथ है । इसके गुरु का नाम चण्ड था और वह नाम से ही चण्ड नहीं, व्यवहार से भी बड़ा क्रूर था । उसी पुरोहित गुरु के कहने के कारण राजा भी अपना सारा राज्य उसके अधिकार में देकर खुश था, क्योंकि क्रूर आदमी राज्य-व्यवस्था को बाहर से बड़ी सफलता से चलाता है । 
"बाहर से" इसलिये कि जैसे ही वह ऊपर का दबाव जाता है, वैसे ही फिर प्रजा में अत्यन्त अव्यवस्था आ जाती है क्योंकि दिल का सहयोग नहीं होता । जैसे जो पिता घर के अन्दर हमेशा लोगों के ऊपर दृढतर शासन करता है, वह जब या तो बुड्ढा हो जाता है या जब वह मर जाये तब उस घर के अन्दर सारे अनिष्ट कार्य होने लगते हैं, क्योंकि समझा कर नियंत्रण नहीं किया था, दबाव के कारण किया था । जैसे ही दबाव हटा, फिर वैसे-के-वैसे, या पहले से भी बुरे हो जाते हैं । 
लेकिन बहुत से लोग इस बात को नहीं समझते । केवल राज्य में ही नहीं, बहुत से लोग अपने मन को हठ से दबाते रहते हैं, समझाते कभी नहीं कि इस चीज में क्या बुराई है । नतीजा यह होता है कि जब कभी मौका मिलता है और दबाव हटता है तो फिर मन वैसे ही वैषयिक प्रवृत्ति करने लग जाता है । इसलिये विचारशील मन को कभी दबाते नहीं । भगवान् श्री वशिष्ठ कहते हैं "लालयेत् न तु ताडयेत्" मन को लाड़ लड़ाना चाहिये, डण्डा मार - मार कर मन वश में नहीं होता । 
नारायण ! चूँकी उसका पुरोहित बाहर से बड़ा कार्यकुशल था, इसलिये राजा कहता था कि इसी को राज्य चलाने दो, खुद मौज करता था । राजा स्वभाव से खोटा नहीं था लेकिन प्रमादी हो गया, सोचता था "अपने आराम से बैठो, राज्य तो वह चलाता ही है" । चण्ड अधिकाधिक दुष्कर्म करने लगा । अंत में उसने मातंगी नाम की चाण्डालिनी के साथ बुरा सम्बन्ध कर लिया । दुष्कर्म करने लगा । 
किसी ने आकर राजा से कहा कि "यह आपका पुरोहित बना हुआ है लेकिन चाण्डालिनी के साथ ऐसा दुष्कर्म करता है ।" राजा को रात्रि में ले गये, देखा तो राजा को बड़ा क्रोध आया कि "मैं तो इसका बड़ा विश्वास करता था। यह बड़ा ही नालायक निकला ।" दूसरे दिन राजा ने पुरोहित को बुलाकर कहा कि "मैंने तेरे भरोसे राज्य छोड़ा और तू ऐसा दुष्कर्म करता है !" राजा ने उसे जूट की रस्सी में बाँध दिया और खौलते तेल में डलवा दिया । वह था तो भयंकर पापी, उसे प्रायश्चित करने का मौका भी नहीं मिला, मौका मिलने पर भी करता या नहीं करता, क्या पता ? वह वहीं मर गया । 
नारायण ! मरकर वह राक्षस बना क्योंकि दुष्कर्मी था । उसका नाम सर्वगिल था अर्थात् सब चीजों को निगलने वाला । उसी ने इस सारे शहर को खत्म कर दिया । अब वही मैं शेर बनकर अपने इस अन्तिम भक्ष्य को खा रहा हूँ । बाकी सबको तो मैंने खत्म कर दिया है । राजा भीमसेन ने कहा कि "तू इतना पापी है तो तेरे से मेरे को कोई डर नहीं है ।" 
संसार में पापी से कभी नहीं डरना चाहिये । जिस दुश्मन पर दो तरफ से आक्रमण हो उस दुश्मन से डरना व्यर्थ है । जो पापी होता है एक तो अन्दर का मन धिक्कार देता रहता है, और दूसरी तरफ सारा समाज उसपर थू - थू करता रहता है । दो तरफ से आक्रान्त पापी कभी नहीं डरा सकेगा । जैसे चोर घर में आया हुआ हो और बुड्ढा आदमी को खाँसी की शिकायत हो, और वह खों - खों करे तो चोर डर जाता है, क्योंकि अन्दर से मन धिक्कार रहा है और बाहर से भी डर रहा है कि कोई देख लेगा । 
पापी के सामने थोड़ा सा जोरे से बोलें तो ठण्डा पड़ जाता है । जब कहते हैं कि "ब्लैक मार्केट करने वाले बड़े जबरे हैं" तो हम कहते हैं कि इनसे नहीं डरो, क्योंकि इनको मन से और समाज से दोनोँ से धिक्कार मिलता है । ये तो वैसे ही मरे हुए हैं , इसलिये इनसे न डरा जाये । इनको छुट्टी दोगे तो ये मन के धिक्कार और समाज के धिक्कार से खुद हटने लगेंगे । राजा भीमसेन ने कहा "मैं तेरे से नहीं डरता । यह मेरी जाति का राजा है, इसे मैं बचाऊँगा ।" उसने शेर को मार डाला । वह शेर ही राक्षस था । 
राक्षस को मारने पर उसके मन में आया कि अब यह सारा गाँव ठीक करना चाहिये । उसने तीन वर्ष तक वहाँ सारे सत्कार्य करवाये, वेदपाठ, यज्ञ, दान, तप आदि करवाये । धीरे - धीरे सारे शहर में फिर लोग बसने लग गये । शुभ स्थान पर सारे - के - सारे बसने आ जाते हैं । फिर से वह शहर बन गया । पुनः वह राजा वहाँ का राज्य करता रहा और भीमसेन अपने राज्य को वापिस चला गया । 
यह एक कथा है । इस कथानक के रहस्य पर आगे सत्संग करूँगा । 
सावशेष ..... 
नारायण स्मृतिः

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