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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*पालड़ी प्रसंग*
दादू जल में गगन में जल है, पुनि वै गगन निरालं ।
ब्रह्म जीव इहिं विधि रहै, ऐसा भेद विचारं ॥२॥
(विचार अं.१८)
पालड़ी के खोजीजी ने दादूजी को पलड़ी में बुलाया था । पालड़ी निवास के समय एक दिन खोजीजी ने दादूजी से पू़छा - जीव और ब्रह्म कैसे रहते हैं ? तब उक्त दो की साखी सुनायी थी । फिर खोजीजी ने पू़छा - आत्मा और राम कहां रहते है ?
तब दादूजी ने कहा -
ज्यों दर्पण में मुख देखिये, पानी में प्रतिबिम्ब ।
ऐसे आतम राम हैं, दादू सब ही संग ॥३॥
(विचार अंग १८)
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पुनः खोजीजी ने पू़छा - साथ हैं तो दीखते क्यों नहीं हैं ?
तब दादूजी ने कहा -
जब दर्पण मांहीं देखिये, तब अपना सूझे आप ।
दर्पण बिन सूझे नहीं, दादू पुण्य रु पाप ॥४॥
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खोजीजी - ज्ञान से कैसे दीखता है ? यह भी समझाइये । दादूजी ने कहा -
जीयें माखन क्षीर में, ईयें रब्ब रुहन्न ॥५॥
मीत तुम्हारा तुम कने, तुम ही लेहु पिछान ।
दादू दूर न देखिये, प्रतिबिम्ब ज्यों जान ॥८॥
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खोजीजी ने पू़छा - प्राणी का मन विषयों में एकमेक हो रहा है, यह कैसे निकले ? तब दादूजी ने कहा -
दादू एक विचार बल, सब तैं न्यारा होय ।
मांही है पर मन नहीं, सहज निरंजन सोय ॥१०॥
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फिर खोजीजी ने पू़छा - आप वैराग्य का स्वरूप भी बतावें ?
दादूजी ने कहा -
दादू सूक्ष्म मांहिले, तिन का कीजे त्याग ।
सब तज राता राम से, दादू यहु वैराग ॥१९॥
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फिर खोजीजी ने पू़छा - मन शरीर के गुणों को कैसे भूले ?
दादूजी ने कहा -
मांही तैं मन काढ़कर, ले राखे निज ठौर ।
दादू भूले देह गुण, विसर जाय सब और ॥२३॥
नाम भुलावे देह गुण, जीव दशा सब जाय ।
दादू छाडे नाम को, तो फिर लागे आय ॥२४॥
उक्त प्रकार खोजीजी और दादूजी की ज्ञान गोष्टी पालड़ी में होती रही थी । उस समय आये हुये आस - पास के संत तथा भक्तों ने अनुभवपूर्ण वचनामृत का पान करके परम तृप्ति प्राप्त की थी ।

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