रविवार, 16 नवंबर 2014

१३. बिपरीत ज्ञानी को अंग ~ ५

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 

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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*१३. बिपरीत ज्ञानी को अंग*
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*ज्ञान की सी बात कहै मन तौ मलीन रहै,* 
*बासना अनेक भरी नैकु न निवारि है ।*
*जैसे कोऊ आभूषन अधिक बनाइ राख्यौ,* 
*कलीई ऊपरि करि भीतरि भंगारि है ॥* 
*ज्यौं ही मन आवै त्यौं ही खेलत निसंक होइ,* 
*ज्ञान सुनि सीख लयौ ग्रंथनि बिचारि है ।*
*सुन्दर कहत वाकै अटक न कोऊ आहि,* 
*जोई वासौं मिलै जाइ ताहि कौं बिगारि है ॥५॥*
मुख से ब्रह्मज्ञान की बात करबे वाले मन में विविध वासनाएँ भरी रहती है; उन को वह किसी तरह त्यागना भी नहीं चाहता । 
जैसे किसी ने निरर्थक आभूषण बना कर पहन रखा हो, किन्तु ज्यौं ही उस आभूषण का सुनहरी रंग(कलई) उड़ जाता है तो उस आभूषण की वास्तविकता सामने आ जाती है कि उस में कितना खोट भरा हुआ है । 
यह ढोंगी ज्ञानी जो मन में आता है वही बोलता रहता है, फिर भले ही उसका वह बोलना शास्त्र के विरुद्ध हो या अनुकूल । क्योंकि उसने शास्त्रों का मनन नहीं किया है, अपितु दूसरे ज्ञानी पुरुषों से थोड़ा बहुत सुनकर दो एक ग्रन्थ कंठस्थ कर लिये हैं । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - उसको ऐसा बोलते हुए कोई संकोच भी नहीं होता है कि वह शास्त्रविरुद्ध बोल रहा है । उसकी इस दुष्ट क्रिया से जो इसका संग करता है वह भी ज्ञानहीन हो जाता है ॥५॥ 
(क्रमशः)

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