मंगलवार, 18 नवंबर 2014

*खालड़ प्रसंग*

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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*खालड़ प्रसंग*
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२१५. चतुस्ताल
हरि केवल एक अधारा, सोई तारण तिरण हमारा ॥टेक॥
ना मैं पंडित पढ़ि गुणि जानूं, ना कुछ ज्ञान विचारा ।
ना मैं अगमी ज्योतिग जानूं, ना मुझ रूप सिंगारा ॥१॥
ना तप मेरे इन्द्रिय निग्रह, ना कुछ तीरथ फिरणां ।
देवल पूजा मेरे नाहीं, ध्यान कछू नहिं धरणां ॥२॥
योग युक्ति कछु नाहीं मेरे, ना मैं साधन जानूं ।
औषधि मूली मेरे नाहीं, ना मैं देश बखानूं ॥३॥
मैं तो और कछू नाहिं जानूं, कहो और क्या कीजे ।
दादू एक गलित गोविन्द सौं, इहि विधि प्राण पतीजे ॥४॥
शाहपुरे के तिलोक शाह ने शाहपुरे पधारे तब पू़छा- स्वामिन् मैं कौन सा साधन करुं ? तब दादूजी ने उक्त २१५ के पद से उन्हें साधन बताया था ।

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