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द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध) राग माली गौड़ २(गायन समय दिन ६ से ९)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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८४. फारसी । शूलताल ~
दरबार तुम्हारे दरदवंद,
पीव पीव पुकारे ।
दीदार दरूने दीजिये,
सुन खसम हमारे ॥टेक॥
तनहाँ के तन पीर है,
सुन तूँ ही निवारे ।
करम करीमा कीजिये,
मिल पीव पियारे ॥१॥
शूल सुलाको सो सहूँ,
तेग तन मारे ।
मिल सांई सुख दीजिये,
तूँ ही तूँ संभारे ॥२॥
मैं शुहदा तन सोखता,
विरहा दुख जारे ।
जिय तरसै दीदार को,
दादू न विसारे ॥३॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव कहते हैं कि हे परमेश्वर ! हम आपके विरहीजन हृदय रूपी दरबार में, आपकी अप्राप्ति रूप विरह के दर्द से “हे पीव ! हे पीव !” ऐसे पुकारते हैं । हे नाथ ! आप अपना दीदार भीतर ही देओ । हे हमारे पति ! हमारी पुकार सुनो ।
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हम विरहीजनों के तन में, आपका वियोग रूपी दुःख हो रहा है, हमारी पुकार सुनो । इस दुःख को आप अपना दर्शन देकर निवारण करोगे । हे कृपालु ! अब हम पर दया रूपी कर्म करो । हे प्यारे प्रीतम ! अब आप मिलो ।
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मैं विरहाग्नि रूप तप्त सलाखों(शूलिका) द्वारा मेरे हृत्पिंड के दग्ध होने जैसी पीड़ा सहन कर रहा हूँ अथवा आपका वियोग रूपी दुःख, सेल की चोट के समान हम सह रहे हैं । यह विरह हमारे तन पर तलवार का सा वार कर रहा है । अब आपके मिलन रूप मंगला(हरिद्रा) मल्हम से ही मुझे सुख - शान्ति प्राप्त होगी ।
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अतः हे हमारे स्वामी ! आप दर्शन देकर हमें सुखी करो । हम आपको ‘तूँ ही, तूँ ही’ करके, बार बार रट रहे हैं । मेरा तन आपके वियोग में अत्यन्त व्याकुल होकर सूखता जा रहा है, जिसे यह विरह रूप दुःख और जला रहा है । हे नाथ ! अब हमारा जीव आपके दर्शनों के लिये तरस रहा है । अब आप हमको न भुलाओ ।
The anguished one earnestly calls out
for her Beloved in Your court.
Listen, O my Lord, reveal Yourself within my heart.
My body aches with loneliness; listen to me,
You alone can cure it.
Have mercy on me, O Merciful One.
Meet me, O my dear Beloved.
My body is stricken by the sword of separation;
Hundreds of wounds I bear in agony.
Grant me the bliss of Your company;
You alone can take care of me.
I am an anchorite, with my body scorched
and burnt in the pangs of separation.
My heart yearns for Your vision;
forget me not, O my Lord, prays Dadu.
(English translation from "Dadu~The Compassionate Mystic"
by K. N. Upadhyaya~Radha Soami Satsang Beas)
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