रविवार, 28 दिसंबर 2014

*~ आंधी प्रसंग ~*


🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷 *#श्रीदादूवाणी०प्रवचनपद्धति* 🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
*~ आंधी प्रसंग ~*
कल्याणपट्टण से आंधी के भक्त दादूजी को आंधीग्राम में ले आये । वहां सत्संग होन लगा । एक दिन सत्संग के पश्चात् दामोदर ने पू़छा - स्वामिन् ! ब्रह्म में वृत्ति लगने की क्या पहचान है ? तब दादूजी ने कहा -
दादू लै लागी तब जानिये, जे कब हूं छूट न जाय ।
जीवित यौं लागी रहै, मूवा मंझ समाय ॥२॥
(लै अंग ७)
.
एक दिन पर्वत नामक व्यक्ति ने पू़छा - स्वामिन् ! ब्रह्म में समाकर कौन साधक रहता है ? तब दादूजी ने कहा -
सब तज गुण आकार के, निश्चल मन ल्यौ लाय ।
आतम चेतन प्रेम रस, दादू रहै समाय ॥४॥
(लै अंग ७)
.
फिर बोहित ने पू़छा - भगवन् ! परमात्मा कहां है ? दादूजी ने कहा -
तन मन पवना पंच गह, निरंजन ल्यौ लाय ।
जहॅ आतम तहॅ परमात्मा, दादू सहज समाय ॥५॥
(लै अंग ७)
.
खेमदास ने पू़छा - स्वामिन् ! परमअर्थ किसको कहते है ? दादूजी ने कहा -
अर्थ अनूपं आप है, और अनरथ भाई ।
दादू ऐसी जानकर, तसौं ल्यो लाई ॥६॥
(लै अंग ७)
.
केशव ने पू़छा - स्वामिन् ! ब्रह्म में वृत्ति कैसे लगे ? दादूजी ने कहा -
ज्ञान भक्ति मन मूल गह । सहज प्रेम ल्यौ लाय ।
दादू सब आरम्भ तज, जनि काही संग जाय ॥७॥
(लै अंग ७)
.
राजू नामक व्यक्ति ने पू़छा - भगवन् ! मुक्ति महल का द्वार कैसे खुलता है ? यह सुनकर दादूजी ने कहा -
योग समाधि सुख सुरति सौं, सहजै सहजै आव ।
मुक्ता द्वारा महल का, इहै भक्ति का भाव ॥९॥
(लै अंग ७)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें