रविवार, 28 दिसंबर 2014

१७. बिरहनी उलाहने को अंग ~ ५

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॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*१७. बिरहनी उलाहने को अंग* 
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*भई हूं अति बावरी बिरह घेरी बावरी,*
*चलत ऊंचौ बाव री, परौंगी जाइ बाव री ।* 
*फिर हौं उतावरी लगत नहिं तावरी,* 
*सु वाही कौ बतावरी चल्यौ है जात ताव री ॥* 
*थके हैं दौउ पांवरी, चढ़त नहिं पावरी,* 
*पियारौ नहिं पावरी, जहर बांटि पावरी ।* 
*दौरत नहिं नाव री, पुकारि कै सुनाव री,* 
*सुन्दर कोउ नावरी, डूबत राखै नावरी ॥५॥* 
॥इति बिरहनि उराहने को अंग॥१७॥ 
मैं तो इनके इस व्यवहार के कारण अत्यधिक पागल हो चुकी हूँ, मुझे इनके विरहवान ने घेर रखा है, यह प्रबल झञ्झावात चल रहा है, मैं किसी बावडी(लंबा चौड़ा कूआं) में जा गिरूँगी । 
मैं अत्यधिक व्यग्र होकर इधर उधर घूम रही हूँ, मुझ पर इस भयंकर धूप का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है । यह बात उन को बता देना जो इतना ताव दिखा कर मुझे छोड़कर चले जा रहे हैं । 
मेरे दोनों पैर चलते - चलते थक गये हैं, अतः वे सूज जाने के कारण, जूते या खडाऊँ में भी नहीं समा रहे हैं । मैं अपने प्राणप्रिय को नहीं प्राप्त कर पा रही हूँ । मेरे पैरों में मानो विष लिपटा हुआ है । 
उनके बिना मेरी यह जीवन नौका तीव्रता नहीं चल पा रही है । यह बात उच्च स्वर से बोल(हल्लामार) कर उन्हें सुना देना । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - कोई नौका सञ्चालन में कुशल नाविक ही अब इस डूबती नौका की रक्षा कर सकता है ॥५॥ 
॥ बिरहिनी उपालम्भ का अंग सम्पन्न ॥१७॥
(क्रमशः)

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