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द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध) राग माली गौड़ २(गायन समय दिन ६ से ९)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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८८. निसारुक ताल ~
दादू दास पुकारे रे,
सिर काल तुम्हारे रे, सर सांधे मारे रे ॥टेक॥
जम काल निवारी रे,
मन मनसा मारी रे, यहु जन्म न हारी रे ॥१॥
सुख नींद न सोई रे,
अपना दुख रोई रे, मन मूल न खोई रे ॥२॥
सिर भार न लीजी रे,
जिसका तिसको दीजी रे, अब ढ़ील न कीजी रे ॥३॥
यहु औसर तेरा रे,
पंथी जाग सवेरा रे, सब बाट बसेरा रे ॥४॥
सब तरुवर छाया रे,
धन जौबन माया रे, यहु काची काया रे ॥५॥
इस भ्रम न भूली रे,
बाजी देख न फूली रे, सुख सागर झूली रे ॥६॥
रस अमृत पीजी रे,
विष का नाम न लीजी रे, कह्या सो कीजी रे ॥७॥
सब आतम जाणी रे,
अपणा पीव पिछाणी रे, यहु दादू वाणी रे ॥८॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव कहते हैं कि हे लोगों ! हम तुमको पुकार कर कह रहे हैं कि काल तुम्हें लक्ष्य बनाकर, रात - दिन रूप धनुष बाण लेकर तुम्हें मार रहा है ।
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तुम अपने मन - बुद्धि को बहिरंग से अन्तर्मुख करके परमेश्वर के नाम - स्मरण द्वारा यमराज को हटाओ । इस मनुष्य जन्म को व्यर्थ नहीं खोना ।
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परमेश्वर के स्मरण बिना, मोह रूप निद्रा में सुखपूर्वक नहीं सोना । अपना जन्म - मरण रूपी दुःख या परमेश्वर की अप्राप्ति रूप दुःख से रुदन करना । हे मन ! सबका कारण रूप जो यह मनुष्य देह है, इसको नाम - स्मरण के बिना वृथा नहीं गँवाना ।
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परमात्मा से विमुख होकर सिर पर पाप रूप बोझा नहीं उठाना । यह मनुष्य देह जिस परमेश्वर का दिया हुआ है उसी के, निष्काम कर्मों द्वारा, इसको समर्पण करना ।
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इस काम में अब देर नहीं लगाना । यही अपने आपका उद्धार करने का तेरा समय है । हे पथिक ! अब मोह रूप निद्रा से जवानी अवस्था में ही सचेत होकर परमेश्वर का नाम स्मरण कर ।
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सब लोग आने - जाने के मार्ग पर बस रहे हैं और यह सब धन, यौवन, माया तो वृक्ष की छाया के समान चंचल है और तेरा शरीर कच्चे घट के समान नाशवान है । इन सबको देखकर सत्यता के भ्रम में परमेश्वर को नहीं भूल जाना ।
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यह सम्पूर्ण संसार रूपी बाजी मिथ्या है, इसको सत्य जानकर राजी नहीं होना । सुख - सागर तो केवल परमेश्वर की भक्ति है । निष्काम नाम - स्मरण रूपी रस को पीना ।
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संसार के विषय - भोगों का किंचित् मात्र भी चिन्तन नहीं करना । यह परमेश्वर ने सत् शास्त्र और सतगुरु ने चेतावनी उपदेशों द्वारा बताया है, इसी को करना ।
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और सब आत्माओं को एकरूप जानकर मुखप्रीति का विषय परमेश्वर को निज आत्म - स्वरूप करके जानना । यही परिचय - सिद्ध मुक्त पुरुषों की वाणी है ।
(क्रमशः)

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