#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
कहबा सुनबा मन खुशी, करबा औरै खेल ।
बातों तिमिर न भाजई, दीवा बाती तेल ॥
दादू करबे वाले हम नहीं, कहबे को हम शूर ।
कहबा हम थैं निकट है, करबा हम थैं दूर ॥
कहे कहे का होत है, कहे न सीझै काम ।
कहे कहे का पाइये, जब लग हृदै न आवै राम ॥
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Mahant Ramgopal Das Tapasvi ~
सुन्दर ज्यौं मुख सौं कहै, त्यौं ही दिल मैं जाप ।
सोई बन्दा सुरखरू, सांई रीझै आप ॥
टीका :--- "कहै कुछ, करे कुछ" वाले भक्त को महात्मा सुन्दरदासजी महत्व नहीं देते । वे कहते हैं ----- भक्त अपने मुख से जिस आराध्य देव का नाम लेता है उसी के नाम का हदय मे जप करे । तभी वह लोक में सम्मानास्पद (सुखर्रू) होता है । तथा स्वयं प्रभु भी उसी पर प्रसन्न हो पाते हैं ।
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बहुत छिपाये आप कौ, मुझे न जांणै कोइ ।
सुन्दर छाना क्यौं रहै, जग में जाहर होइ ॥
टीका:--- सच्चा भक्त स्वयं को संसार से कितना ही छिपावे, परन्तु वह छिपा नहीं रहता; अपितु अन्त में भक्त के रूप मे प्रसिघ्द(जाहिर) हो ही जाता है ।
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मुख सेती बंदा कहै, दिल मे अति गुमराह ।
सुन्दर सो पावे नही, सांई की दरगाह ॥
टीका:--- ऐसा न हो कि कोई मुख से तो स्वयं को ''भक्त" कहे और उस के मन में कूड़ा कपट अहंकार आदि भरा रहे । ऐसे भक्त को भगवान के श्रीचरणों में कभी स्थान नहीं मिल सकता ।
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सुन्दर बंदा बंदगी, सदा रहे इकतार ।
दिल में और न दूसरा, सांई सेती प्यार ॥
टीका:--- भक्त को प्रभु की भक्ति सदा समान भाव से करनी चाहियें । ऐसा न हो कि वह स्वामी के प्रति अपने मन में कुछ भाव रखे, और बाहर दिखाने के लिये अन्य कुछ कहे । प्रभु भक्ति मे ऐसा दैव्त भाव रखने से भक्त का कार्य सिद्ध नहीं होता l
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सुन्दर बंदा चुस्त है, जौ पैठै दिल मांही ।
तौ पावै उस ठौर ही, बाहिर पावै नांहि ॥
श्री सुन्दरदासजी उसी भक्त को उचित पथ का अनुयायी मानते हैं जो अपने आराध्यदेव को स्वहदय में ही खोजता है; क्योकि हमारा हदय उस प्रभु का उचित स्थान है l हदय से बाहर खोजने पर वह किसी को कहाँ मिल पायेगा ।
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॥ सत्य राम सा ॥

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