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द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध) राग माली गौड़ २(गायन समय दिन ६ से ९)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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८६. करुणा । शंखताल ~
मुझ थीं कुछ न भया रे, यहु योंही गया रे,
पछतावा रह्या रे ॥टेक॥
मै शीश न दीया रे, भर प्रेम न पीया रे,
मैं क्या कीया रे ॥१॥
हौं रंग न राता रे, रस प्रेम न माता रे,
नहिं गलित गाता रे ॥२॥
मैं पीव न पाया रे, कीया मन का भाया रे,
कुछ होइ न आया रे ॥३॥
हौं रहूँ उदासा रे, मुझे तेरी आशा रे,
कहै दादू दासा रे ॥४॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि अपने को उपलक्षण करके कह रहे हैं कि हमारे से परमेश्वर की प्राप्ति के लिये कुछ भी साधन नहीं हुए । यह हमारा मनुष्य शऱीर, मैं - मेरेपन में वृथा ही जा रहा है । हमारे अन्तःकरण में यह पश्चाताप हो रहा है कि ....
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हमने परमेश्वर के दर्शनों के लिये अपना शीश उनको भेंट नहीं किया । इसीलिये हम प्रेमाभक्ति का अमृत नहीं पी सके । इस मनुष्य जन्म में आकर हमने कुछ भी कर्म परमात्मा की प्राप्ति के लिये नहीं किया,
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हम परमेश्वर के भक्ति वैराग्य रूपी रंग में कभी भी रत्त नहीं हुए और न प्रेमाभक्ति के रस को पीकर मतवाले ही हुए । हमारा यह ‘गात’ कहिये शरीर, प्रभु प्रेम में हमने गलतान नहीं किया ।
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इसीलिये हम अब तक पीव का दर्शन नहीं कर सके । जो हमारे मन को भाये, वे ही हमने बहिरंग काम किये ।
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उनसे कुछ भी हमारा सुधार नहीं हुआ । इसी से हम अब उदास हो रहे हैं । हे प्रभु ! अब तो हमें केवल आपकी ही आशा है । हम आपके ही दास हैं ।
(क्रमशः)

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