#daduji
तुलसी नामक व्यक्ति ने पू़छा- स्वामिन् ! भक्त अविनाशी ब्रह्म का स्वरूप कब होता है ? दादूजी ने कहा-
परिचय पीवे राम रस, सो अविनाशी अंग ।
काल मीच लागे नहीं, दादू सांई संग ॥ ३४१ ॥
उक्त उत्सव में एक डोंगसी नामक सज्जन भी आये थे । उन्होंने पू़छा- भगवन् ! आपने कहा कि ज्ञानी भक्त को काल नहीं खाता है सो उसमें क्या कारण है ? क्यों नहीं खाता है ? दादूजी ने कहा-
परिचय पीवै राम रस, सुख में रहै समाइ ।
मनसा वाचा कर्मणा, दादू काल न खाइ ॥ ३४४ ॥
फिर डोंगसी दादूजी के शिष्य हो गये थे । ये दादूजी के सौ शिष्यों में हैं । फिर पूरा नामक व्यक्ति ने पू़छा- भगवन् ! इस संसार में रहते हुये साधक काम क्रोधादि दुर्गुणों से और इस संसार के कैसे छूटते हैं ? दादूजी ने कहा-
परिचय पीवे राम रस, राता सिरजनहार ।
दादू कु़छ व्यापे नहीं, ते छूटे संसार ॥ ३४३ ॥
फिर पूरा दादूजी के शिष्य हो गये थे । ये दादूजी के सौ शिष्यों में हैं ।

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