सोमवार, 12 जनवरी 2015

#daduji 
दादू सतगुरु सूं सहजैं मिल्या, लिया कंठ लगाइ ।
दया भई दयाल की, तब दीपक दिया जगाइ ॥
==================================
Gautam Chauhan ~ 
< शिष्य धर्म > जो गुरू के पास दास की तरह रहता हो, और हमेशा हनुमान की तरह आगया पालन करने को तत्पर हो, वही वास्तविक शिष्य है । जो वास्तव मेँ शिष्य बन गया, वह गुरू से कभी दुर नहीँ हो सकता, जिस प्रकार परछाईँ कभी वस्तु से दुर नहीँ हो सकती; उसी प्रकार शिष्य भी गुरू के सदैव करीब बना रहता है । शिष्य के लिए गुरू ही सर्वस्व है । गुरू ही उसके लिए माता - पिता, एवं सच्चा मित्र हो सकता है । वास्तविक शिष्य के लिए संसार के सारे सम्बन्ध नगण्य हो जाते हैँ, क्योँकी वह पूर्णतः गुरू मेँ समाहित हो जाता है । शिष्य के लिए गुरू से बढकर कोई वेद, शास्र या ग्रंथ नहीँ है, गुरू से बढकर कोई देव या इष्ट नहीँ है, गुरू ही उसके लिए सर्वस्व है । एक शिष्य के लिए गुरू-चरणोँ के अतिरिक्त कोई मंदिर या तीर्थ नहीँ, वह गुरू चरणोँ मेँ ही समस्त देवी देवताओँ एवं तीर्थ का दर्शन कर लेता है । अधिक से अधिक गुरू-सेवा करने की अदम्य इच्छा शिष्य मेँ होनी चाहिए । गुरू सेवा ही समस्त साधनाओँ एवं सिध्दियोँ की कुंजी है ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें