#daduji
शरीर सरोवर राम जल, माहीं संजम सार ।
दादू सहजैं सब गए, मन के मैल विकार ॥
दादू रामनाम जलं कृत्वां, स्नानं सदा जित: ।
तन मन आत्म निर्मलं, पंच-भू पापं गत: ॥
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अद्भिर्गात्राणि शुद्धयन्ति मन: सत्येन शुद्धयन्ति |
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धि ज्ञानेन शुद्धयति ||
- मनुस्मृति
अर्थ : मानव काया जलसे शुद्ध होती है, मन सच बोलनेसे, जीव आत्मा (सूक्ष्म देह) विद्यासे और तपसे और बुद्धि ज्ञानसे शुद्ध होती है |
भावार्थ : आजकी पीढीको हम मात्र तनकी शुद्धि सिखाते हैं इसलिए वे दिशाभ्रमित हो रही है | वस्तुत: मानव शरीरके चार भाग हैं – स्थूल देह जिसे हम देख सकते हैं, मन, बुद्धि और अहं | खरे अर्थोंमें मन, बुद्धि और अहंकी शुद्धिसे ही मानवमें देवत्व आता है !
मनकी शुद्धिसे मनकी स्थिरता बढती है | आज तो वैज्ञानिक भी कहने लगे हैं कि मनुष्यके अधिकांश रोग साइकोसोमेटिक(psychosomatic) हैं अर्थात अशांत मनके कारण शरीरका अस्वस्थ रहना; परंतु हमारी शिक्षण पद्धतिमें कहीं भी मनका निग्रह करना नहीं सिखाया जाता है; अतः आज चारों ओर भ्रष्टाचार, व्यभिचार और अनाचार व्याप्त है, यह सब मनकी अशुद्धिका स्थूल प्रकटीकरण है और कुछ भी नहीं |

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