गुरुवार, 1 जनवरी 2015

= ७७ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
दादू गुण निर्गुण मन मिल रह्या, क्यों बेगर ह्वै जाहि । 
जहँ मन नांही सो नहीं, जहँ मन चेतन सो आहि ॥
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साभार : सर्वज्ञ शङ्करेन्द्र
!! श्री गुरुभ्यो नमः !!
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एकता की संस्कृति { १ }
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नारायण ! अतिधन्य श्रुतिभगवती{वेद} ने समाज और व्यक्ति के सामने एक दिव्य आदर्श रखा जिसकी उपलब्धि सभी स्तरों पर समन्वित साधना का परम कल्याणमय फल है । श्रुतियों का आदर्श कोरी कल्पना नहीं वरन् दार्शनिक चिन्तन का गाम्भीर्य परिपाक है। सांसारिक दशा में हम वास्तविकता उसे कहते हैं जिसका अनुभव होता है । अनुभव में द्वैत है, अनुभव की परिसमाप्ति अद्वैत में है । आप और सामने पड़ा घड़ा दो हैं, देखने की प्रक्रिया का आश्रय आप हैं । "मैंने घड़ा देख लिया" यह आपका अखण्ड भान है, इसमें अद्वैत है । अनुभव का मूल द्वैत है, पर्यवसान अद्वैत है ।
"अद्वैयः सर्वभावानां द्वयेन परिलक्ष्यते ।"
सभी वस्तुओं का द्वैतराहित्य समझा द्वैत के सहारे जाता है । अनुभव करने के लिये एक अखण्ड को भग्न करना पड़ता है - ज्ञाता - ज्ञान - ज्ञेय ये खण्ड रहते ही अनुभव किया जा सकता है - परन्तु परिसमाप्ति अद्वैत में है, अनुभव होने पर खण्डों का महत्त्व नहीं रह जाता ।
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नारायण ! अद्वैत वास्तविक और द्वैत व्यावहारिक है इसका कई स्तरों पर पोषण हो जाता है, लौकिक ज्ञानों में यह बात प्रकट हो जाती है कि ब्रह्माण्ड की परायणता अद्वैत की ओर है । द्रव्य और ऊर्जा में पहले द्वैत मानते थे. इसे "आईन्ट्स्टाइन" ने हटाया । जड़ पदार्थ ऊर्जा का घनीभूत रूप है और ऊर्जा मूलभूत में द्रव्य है अर्थात् एक ही वस्तु दो दृष्टिकोणों से दो प्रकार की अनुभव में आती है, वस्तुएँ दो नहीं हैं, अद्वैत है । ऐसे ही पहले जैव और अजैव ये रसायनशास्त्र के भेद पर थे पर यूरिया के आविष्कार से वह द्वैत दूर हो गया । भौतिकी के अनुसार विद्युदणु अर्थात् electron द्रव्य - ऊर्जा दोनों में होने से जडाद्वैत है । सभी विज्ञानों में जैसे - जैसे दृष्टि का परिष्कार होता गया वैसे - वैसे अद्वैत आया ।
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नारायण ! जड और चेतन जगत् भी दो पदार्थ नहीं, ये एक की ही अभिव्यक्ति है । कुछ साल पूर्व अमरीका में DND श्रृंखलाओं का भी अन्वेषण हो चुका है । मन और दृश्य द्रव्यो का द्वैत भी दूर होने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो रही है । शरीर - मन का एक - दूसरे पर प्रभाव पड़ता रहता है । "मनोदैहिक चिकित्सा पद्धति" अर्थात् psychosomatic medicine अगर आपके दाँतों में दर्द है तो उसका कारण उक्त चिकित्सा पद्धति मानस - कारण बताती है । हमें बाह्य शरीर और भावना - जगत् में भेद प्रतीत होता है पर भेद कल्पित है, भावनाए और द्रव्यादि यों एकमेक हैँ कि सर्वथा अलग कि सर्वथा अलग किये नहीं जा सकते, उन्हें सर्वथा पृथक मानते रहने से उनके बारे में समग्र जानकारी नहीं हो पाती, उनका अभेद अन्ततः स्वीकारना पड़ता है ।
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नारायण ! विचारदृष्टि से जीव समस्त संसार में बिन्दु की तरह है । बिन्दु ही रेखा का मूल कारण होता है, ऐसे ही इस "चिद् बिन्दु" में सारा विश्व निहित है । व्यक्ति - समाज का भेद द्वैत की विचारधारा से है । अनुभव की गंभीरता से आप देखें तो पता चलता है कि भेद काल्पनिक है । जैसे गणित में "निर्देशांकों" x - y coordinates का भेद या भूगोल में अक्षांश रेखांश का भेद अनेक व्यवहारों के लिये अत्यावश्यक होते हुए भी पारिभाषिक या काल्पनिक ही है, इन "रेखाओं" को और इनके भेदों को सच्चा समझना जैसे गलती है वैसे ही व्यक्ति - समाज में सत्य भेद समझना भी भूल ही है । एक सरल सज्जन ने "भूमध्य रेखा" के बारे में सुन रखा था । पानी के जहाज में यात्रा करते हुए उस क्षेत्र में पहुँचे तो कप्तान से बोले "भूमध्य रेखा कहाँ है ? दिखाइये !" वह भी मज़ाकिया था, उसने एक बाल तोड़कर दूरबीन के काँच पर रख दिया, कहा "इसमें देखो, दीख जायेगी वह रेखा । "वे सज्जन खुश होकर बोले - "हाँ, दीख रही है, उस पर एक ऊँट भी चल रहा है !" क्योँकि बाल पर एक जूँ रेंग रही थी ! 
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जैसे भूमध्यरेखा को धरती पर उकेरी रेखा समझना भ्रम है यद्यपि उसे मानकर उत्तर - दक्षिण आदि बहुत - सा सफल व्यवहार चलता है ऐसे ही कोई भी भेद इससे सिद्ध नहीं होता कि वह कार्यकारी है, कल्पित भेद भी कार्यकारी हो जाता है । यद्यपि बिन्दु वास्तविक होता है तथापि निर्देशांकों की अपेक्षा से निश्चित की गयी उसकी स्थिति कल्पित होती है या अक्षांश - रेखांश धरती पर लकीरें नहीं हैं पर उनसे समझे गाँव - शहर सच्चे हैं ऐसे ही समाज - व्यक्ति का भेद सच्चा नहीं है वरन् अनेक व्यवहारों की व्याख्या के लिये माना गया है । मानव किसी एक स्थूल शरीर में परिबद्ध नहीं है, उसकी भावनाएँ, स्मृतियाँ अनन्त हैं । आत्मा की अनंतता को सीमित करना ही असम्भव है ।
सावशेष ......
श्री नारायण हरिः !

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