#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
दादू परमारथ को सब किया, आप स्वारथ नांहिं ।
परमेश्वर परमारथी, कै साधू कलि मांहिं ॥
खालिक खेलै खेल कर, बूझै विरला कोइ ।
लेकर सुखिया ना भया, देकर सुखिया होइ ॥
===================
बिष्णु देव चंद्रवंशी ~
--||●||●|| पाप खाने से बचो ||●||●||--
भारतवर्ष में लाखों-करोड़ों व्यक्ति इतने गरीब हैं, जिनको रोज भरपेट भोजन नहीं मिलता, तन ढकने को कपडा नहीं मिलता, दूध, चिकित्सा, आराम का घर आदि तो बहुत दूर की बातें हैं । फिर आज की भयंकर महँगाई ने तो मानो प्राणियों पर राक्षसी धावा ही बोल दिया है । इस अवस्था में जिनके पास जो कुछ भी साधन हैं, उनके द्वारा इन अभावग्रस्त प्राणियों की अपने-ही-जैसे प्राण-मन वाले मानवों की सेवा करनी चाहिये - यह धर्म है और इसकी उपेक्षा बहुत बड़ा पाप है ।
.
सच तो यह है कि यहां कुछ भी किसी का नहीं है, सभी भगवान् का है और उसे यथासाध्य आवश्यकतानुसार प्राणिमात्र की सेवा के द्वारा भगवान् की सेवा में लगाना है । वस्तुतः सभी प्राणी भगवान् की ही अभिव्यक्ति हैं । अतएव इनकी सेवा में किसी वस्तु का अर्पण करना भगवान् की वस्तु भगवान् की सेवा में लगाना मात्र है । यह ईमानदारी है, कोई महत्व की बात नहीं । श्रीमद्भागवत में देवर्षि नारदजी के वाक्य हैं - जितने से अपना पेट भरे, उतने पर ही मानवों का अधिकार है । जो उससे अधिक पर अपना अधिकार मानता है, उसे दण्ड मिलना चाहिये ।
.
लगभग हर मनुष्य के अंदर ये भाव बिद्यमान रहते हैं ....
*१. मैं हूं* - परन्तु सच तो ये है कि आने वाले दिनों में आप का आस्तित्व ही नहीं रहेगा ये तन तो पंचतत्व है और अंत में उसी में विलीन होना है ।
*२. मेरा है* - कोई भी वस्तु किसी का है ही नहीं आप उसे अपने कब्जे में तब तक रख सकते हैं जब तक आप जीवित हैं और कभी कभी तो समय भी ऐसा बलवान हो जाता है कि आप के हाथों से आप का अपनी वस्तु छूट रही होती है और आप विवश हो जाते हैं सिवाय देखने के ।
.
*३. मैंने दिया* - आप जब कुछ ले कर ही नहीं आए तो फिर देने का क्या अर्थ होता है सभी मनुष्य जो कुछ भी पाते हैं एक मात्र इश्वर की कृपा से ही पाते हैं । आप स्वयं कभी कभी अनुभव करते होंगे घर पर कुछ खाने के लिए लाये परन्तु उसमें से आप को नसीब ही नहीं हुआ कि आप खा सकें, आप के खाने से पहले ही घर में परिवार जन उसे चट कर बैठते हैं फिर ये आप ने कैसे सोच लिया कि जो आप को मिला है वो अपने बलबूते पर मिला है ।
.
*४. मैंने किया* - जब तक श्री हरी की इच्छा न हो तब तक आप कुछ भी करने में अक्षम हो आप मेहनत तो करते हैं परन्तु कभी कभी उसका फल आप को नहीं मिलता ऐसा क्यों ? आप को अपने कर्मों पर बिस्वास है तो फिर ऐसा क्यों ?
.
जब ये तन इश्वर का है और धन भी इश्वर का है तो इसे परोपकार में लगा कर अपने जीवन को सार्थक बनाओ पाप के भागी मत बनो ये मनुष्य तन मिला है कर्म करने को मनुष्य योनि कर्म योनि मानी गई है बाकी योनि भोग योनि मानी गई है अतः ऐसा कर्म करो कि तुम्हारा जीवन सार्थक हो जाए साथ साथ उसका भी परोपकार करते जाओ जो असहाय है याद रखो तुम उतना ही भोजन हजम कर सकते हो जितना हजम करने को ताकत तुम्हें इश्वर ने प्रदान किया है ज्यादा खाओगे तो हजम नहीं होगा । इस लिए पाप खाने से बचो ।
.
देवर्षि नारद के उन शब्दों पर ध्यान दीजिये । हमारा कुछ है ही नहीं । उदर-पोषण भर की वस्तु स्वामी ने हमें दी है; इससे अधिक को अपनी वस्तु मानना तो बेईमानी - चोरी है । हमें यदि भगवान् ने कोई वस्तु दी है तो वह इसी प्रकार दी है कि, जैसे भला मालिक किसी सेवक को ईमानदार मानकर उसे अपनी वस्तु सँभालकर रखने तथा आवश्यकतानुसार अपनी सेवा में लगाने की लिए देता है, न कि व्यर्थ खोने या अपनी मानकर यथेच्छ भोगने के लिए । अतएव जहाँ-जहाँ जिस-जिस वस्तु का अभाव है, वहाँ-वहाँ भगवान् मानो अपनी उस-उस वस्तु को माँगते हैं और जिस-जिस के पास जो-जो वस्तु है, उसे-उसे वह-वह वस्तु प्रसन्नचित्त से देनी चाहिये ।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें