#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
दादू चंदन बावना, बसै बटाऊ आइ ।
सुखदाई शीतल किये, तीनों ताप नसाइ ॥
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श्रीभागवत सुखसागर प्रज्ञापुराण ~ *प्रज्ञापुराण भाग - १.१६
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साथ जुड़े श्रेय पाया ... विगत अवतारों में उसके सामयिक सहयोगियों का अविस्मरणीय अनुदान रहा है !
राम अवतरण में लक्ष्मण, हनुमान, अंगद, विभीषण, सुग्रीव, नल-नील जैसे वरिष्ठ और सामान्य रीछ वानरों जैसे कनिष्ठ समान रूप से सहगामी रहे हैं ! गिद्ध-गिलहरी जैसे अकिंचनों ने भी सामर्थ्यानुसार भूमिकाएँ निभाई हैं ! कृष्ण काल में पांडवों से लेकर ग्वाल-बालों तक का सहयोग साथ रहा है ! बुद्ध के भिक्षु और गाँधी के सत्याग्रही कंधे से कंधा मिलाकर जुटे और कदम से कदम मिलाकर चले हैं !
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भगवान सर्व समर्थ है, वे चाहें तो उँगली की नोंक पर पर्वत उठा सकते हैं और बारह-नृसिंह की तरह अकेले ही अभीष्ट प्रयोजन पूरे कर सकते हैं, किन्तु प्रियजनों को श्रेय देना भी अवतार का एक बड़ा काम है ! शबरी और कुब्जा जैसी महिलाओं और केवट और सुदामा जैसे पुरूषों को भी अवतार का सखा सहचर होने का लाभ मिला था ! बुद्ध के सहचर आनन्द जैसे असंख्यों को श्रेय मिला था ! भगवान के अन्य भक्तों में से नारद जैसे देवऋषि, वशिष्ठ जैसे महर्षि और विभीषण जैसे अगणितों को अविच्छिन यश पाने का अवसर मिला है !
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सहकारिता को, संगठन की सर्वोपरि शक्ति के रूप में प्रतिपादित करने के लिए महान शक्तियाँ सदा ही यह प्रयत्न करती रही हैं की जागृतों को महत्वपूर्ण अवसरों पर अग्रिम पंक्ति में खड़े होने के लिए उभरा जाए ! अर्जुन के साथ तो इसके लिए भर्त्सना जैसे उपाय बरते गये थे ! सुग्रीव को धमकाने लक्ष्मण पहुँचे थे ! परमहंस-विवेकानन्द को घसीट कर लाये थे ! आम्ब्रपाली, अंगुलिमाल, हर्षवर्धन और अशोक से जो लिया था उससे असंख्य गुना उन्हें लौटाया गया था ! भामाशाह के सौभाग्य पर कितने ही धनाध्यक्ष ईर्ष्या करते रहते हैं !
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महानता की अपनी निजी सामर्थ्य है ! उसके आधार पर वह स्वयं गरिमा प्रकट करती ही है, साथ ही अपने संपर्क परिकर को भी उन विशेषताओं से भरती और कृतकृत्य बनाती देखी गई है ! यह एक परीक्षित तथ्य है, सृजन प्रक्रिया में सहयोग देने वाले कभी घाटे में नहीं रहते ! सामयिक रूप से तो उन्हें कष्ट ही सहना पड़ता है, लगता वह घाटे का सौदा ही है पर अन्ततः परिणाम सुखद ही होता है !!

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