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द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध)
राग कान्हड़ा ४(गायन समय रात्रि १२ से ३ बजे तक)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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१०४. संत सहाय रक्षा । राज मृगांक ताल ~
पीव तैं अपने काज सँवारे ।
कोई दुष्ट दीन कों मारन,
सोई गहि तैं मारे ॥टेक॥
मेरु समान ताप तन व्यापै,
सहजैं ही सो टारे ।
संतन को सुखदाई माधो,
बिन पावक फँद जारे ॥१॥
तुम थैं होइ सबै विधि समर्थ,
आगम सबै विचारे ।
संत उबार दुष्ट दुख दीन्हा,
अंध कूप में डारे ॥२॥
ऐसा है सिर खसम हमारे,
तुम जीते खल हारे ।
दादू सौं ऐसे निर्बहिये,
प्रेम प्रीति पिव प्यारे ॥३॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव जिज्ञासुओं को बता रहे हैं कि परमेश्वर सदा सहायक होकर भक्तों की रक्षा करते हैं । हे परमेश्वर ! आप इस संसार में अपने आत्मीयजन अनन्य भक्तों के सम्पूर्ण काज सुधारते हो । यदि कोई दुष्ट लोग, आपके भक्तों को आकर सतावे, तो आप तत्काल उसको पकड़कर मारते हो ।
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पहाड़ के समान भी, जो भारी ताप आपके भक्तों को होवे, तो उसको आप स्वभाव से ही निवारण कर देते हो । हे माधव ! आप अपने संतभक्तों को सदा सुखदायी रहते हो । उनके संचित कर्मरूपी सम्पूर्ण कर्म - बन्धनों को बिना ही अग्नि के जलाते हो ।
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हे समर्थ ! आपसे सब प्रकार, आपके भक्तों के सम्पूर्ण कार्य पूरे होते हैं । आप भक्तों पर आने वाले के सुख दुःख आदि को प्रथम ही विचार कर देख लेते हो । इस प्रकार आप संसार - समुद्र से या दुष्टों की त्रास से अपने संतभक्तों को बचाते हो और उन दुष्टों को उनके कर्मानुसार दुःख देते हो । इस संसार - कूप में उनको जन्म - मरण के दुखों में डालते हो ।
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हे समर्थ ! ऐसे आप हमारे मालिक, हमारे सिर पर हो । आपकी हमेशा ही जीत होती है और दुष्ट आपके सामने सदा हार मान लेते हैं । हे मुख प्रीति के विषय पीव ! हमारी आप निबाहो, तभी हम निबहेंगे । हमने तो प्रेमपूर्वक अपनी प्रीति आपसे ही लगाई है ।
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गरुदादू को कपट कर, मारन मेले नीच ।
तब स्वामी यह पद कह्यो, दुष्ट कूप के बीच ॥ १०४ ॥
दृष्टान्त ~ पक्षपाती साम्प्रदायिक लोगों को ब्रह्मऋषि सतगरुदेव का पक्षपात रहित उपदेश प्रिय नहीं लगा । तब उन लोगों ने महाराज को मारने के लिये षड़यंत्र रचा । एक गहरा गड्ढ़ा खोदा । उसके ऊपर बारीक बारीक कूंचों की सींकें लगा दी और ऊपर सफेद चद्दर बिछाकर, सामने किनार पर मसनद रख दी ।
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पतली सी एक चद्दर गद्दी के ऊपर बिछा दी । जब महाराज को शिष्यों के सहित बुलाकर लाये, परमगुरुदेव ने अपनी छड़ी से उस चद्दर का एक पल्ला पलटा और गड्ढ़े के अन्दर बड़े बड़े हथियार खड़े शिष्यों को दिखाए । वे दुष्ट लोग शर्मिन्दे हो गये और आप ही अपने कर्मों से लज्जित होकर कूप में गिर कर मर गये ।
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खाडा बूचि भक्त है, लोहट वाड़ा माहि ।
परगट पेड़ा इत बसे, तहा सन्त काहे को जाय ॥
दृष्टान्त ~ आमेर श्री गलता जी में कुछ संतों ने श्री दादू महाराज के प्रति विरोध फैलाना चाहा कि सांभर में दादू जी ने अलग संप्रदाय चलाया है उनको अपने संप्रदाय में मिला लेते हैं । महापुरुष श्री गालव ऋषि ने मना किया । कहा कि श्री दादू जी महापुरुष हैं, उनको आप लोग कुछ भी मत कहो, लेकिन कुछ संत जिद्दी थे उन्होंने नहीं माना और चार संतों को सांभर भेज ही दिया । रामघटादास, गैबीदास, जंगीदास, छीतरदास सांभर जाकर चारों संतों ने श्री दादूजी महाराज से कहा कि आप माला तिलक ले लो, श्री दादू जी महाराज ने मना कर दिया । कहा -
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“दादू माला तिलक से कुछ नहिं, काहु सैति काम ।
अंतर मेरे एक है अहनिश उसका नाम ॥”
छीतरदास जी ने कई प्रश्न किये श्री दादूजी महाराज ने उनका उत्तर दिया । छीतरदास जी तो वहीं रह गये श्री दादू जी महाराज पास में, तीन संत वापस आये लेकिन वे तीनों संत क्रोध से भरे हुए थे । गलता जी आकर चार डाकुओं को भेजा श्री दादू जी को मारने के लिए, वे चार - झाझू, माझू, सादा और परमानन्द, ये चारों ही भंयकर प्राणघातक थे, पर श्री भगवान को अच्छा नहीं लगा, उन चारों को अंधकूप में डाल दिया, उनके प्राण घबराये तब श्री दादू जी महाराज ने कृपा करके कहा -
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पिव तैं अपने काज संवारे ।
कोई दुष्ट दीन को मारन, सोई गहितैं मारे ॥टेक॥
यह पद कहा तब वह चारों ही अंधकूप से निकल गये, वापस ही श्री गलता जी पहुँच गये । गालव ऋषि ने कहा - दुष्टों, दादू जी महाराज से जाकर माफी माँगो, वे चारों ही सांभर जाकर माफी मांगी और श्री दादू जी के शिष्य बन गये । झोटवाड़ा झाझू, माझू और सादा, परमानन्द इन्दोखली में । इन चार का भी श्रीदादू महाराज ने उद्धार किया, इनके ऊपर भी अति कृपा हुई ।
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मेले आवत साधु को, लूटण लागे मूढ़ ।
चढ़ घोड़े रक्षा करी, भेद दियो न गूढ़ ॥१०४॥
दृष्टान्त ~ एक उत्तराध के महात्मा संत - सेवा के लिये रुपये लेकर नारायण मेले में आ रहे थे । रास्ते में चोरों ने उनका भेद पाकर, उनके साथ लग गये और बोले ~ आपके साथ आपका कोई रक्षा करने वाला भी है, इस जंगल में ? संत बोले ~ समर्थ स्वामी हमारी रक्षा करने वाला है । चोरों ने देखा कि कोई समर्थदास नाम का स्वामी आगे पीछे होगा ।
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इधर - उधर उन्होंने देखा तो कोई दिखलाई नहीं पड़ा । फिर बोले ~ कि वह कहाँ है समर्थ स्वामी ! संत बोले ~ “आ रहे हैं” । साधु बोले “सहज स्वभाव साध का बोला वृथा न जाव” । समर्थ परमेश्वर, घोड़े पर सवार होकर सामने से आते दिखाई दिये । चोर लज्जित हो गये । भय से घबरा उठे ।
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जब तक नगर न आया, तब तक समर्थ घोड़े पर साथ ही चलते रहे, परन्तु अपना भेद किसी को भी नहीं दिया और अन्तर्धान हो गये । फिर संत ने विचार किया कि हो न हो, वह तो परमेश्वर थे । उन्होंने ही मेरी रक्षा की है । बारम्बार मन ही मन में परमेश्वर को नमस्कार करने लगे और सम्पूर्ण सम्पत्ति को परमेश्वर के निमित्त, संत - सेवा में आकर लगा दी ।
(क्रमशः)

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