#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
दादू दुई दरोग लोग को भावै,
सांई को साँच पियारा ।
कौन पंथ हम चलैं कहो धू, साधो करो विचारा ॥
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Gyan-Sarovar(ज्ञान-सरोवर) ~
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः |
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ||
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आस्तिक-से-आस्तिक हो अथवा नास्तिक-से-नास्तिक, दोनों के लिए भगवान् का विधान बराबर है | एक व्यक्ति बड़ा आस्तिक है, भगवान् को बहुत मानता है और उन्हें पाने के लिए साधन-भजन करता है और एक व्यक्ति ऐसा नास्तिक है कि संसार से भगवान् का खाता उठा देना चाहता है |
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भगवान् को मानने से और भगवान् के कारण ही दुनिया दुःख पा रही है, भगवान् नाम की कोई चीज है ही नहीं-ऐसा उसके हृदय में भाव है और ऐसा ही प्रचार करता है | ऐसे नास्तिक-से-नास्तिक व्यक्ति की भी प्यास जल मिटाता है और यही जल आस्तिक-से-आस्तिक व्यक्ति की भी प्यास मिटाता है | जल में यह भेद नहीं है कि वह आस्तिक की प्यास ठीक तरह से शान्त करे और नास्तिक की प्यास शान्त न करे |
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वह समान रीति से सबकी प्यास मिटाता है, ऐसे ही सूर्य समान रीति से सबको प्रकाश देता है, हवा समान रीति से सबको श्वास लेने देती है, पृथ्वी समान रीति से सबको रहनेका स्थान देती है | इस प्रकार भगवान् की रची हुयी प्रत्येक वस्तु सबको समान रीति से मिलती है | .......यदि समता लानी हो तो दूसरा व्यक्ति किसी भी वर्ण, आश्रम, धर्म, सम्प्रदाय, मत आदि का क्यों न हो, उसे सुख देना है, उसका दुःख दूर करना है और उसका वास्तविक हित करना है |
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उनमें यह भेद हो सकता है कि आप राम-राम कहते हैं, हम कृष्ण-कृष्ण कहेंगें; आप वैष्णव हैं, हम शैव हैं; आप मुसलमान हैं, हम हिन्दू हैं, इत्यादि | परन्तु इससे कोई बाधा नहीं आती | बाधा तब आती है, जब यह भाव रहता है कि वे हमारी पार्टी के नहीं हैं, इसलिए उनको चाहे दुःख होता रहे पर हमें और हमारी पार्टीवालों को सुख हो जाय | यह भाव महान पतन करनेवाला है |
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इसलिए कभी किसी वर्ण आदि के मनुष्यों को कष्ट हो तो उनके हित की चिन्ता समान रीति से होनी चाहिए और उन्हें सुख हो तो उससे प्रसन्नता समान रीति से होनी चाहिए |

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