#daduji
गुरु के प्रसाद बुद्धि, उत्तम दशा को गृहै |
गुरु के प्रसाद भाव दुःख बिसराइये ||
गुरु के प्रसाद प्रेम प्रीतिहू अधिक बढे |
गुरु के प्रसाद राम नाम गुण गाइये ||
गुरु के प्रसाद सब जोग की जुगति जाणे |
गुरु के प्रसाद शून्य में समाधि लाइये ||
'सुंदर' कहत गुरुदेव जो कृपालु होइ |
गुरु के प्रसाद तत्व ज्ञान पुनि पाइये ||
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आज हम शेख फरीद जी का ज़िक्र करते हैं ।
शेख फरीद जी बहुत छोटी उम्र में ही प्रभु के प्यार में रंग गए थे । बहुत छोटी उम्र से ही पांचो समय की नमाज़ पढा करते थे । उन्हें तपस्या करते हुए चौबीस वर्ष पूरे होने को थे ।
एक दिन वे बंदगी में बैठे थे । बहुत देर से पेड़ पर बैठी चिड़िओं के शोर से उनकी बंदगी में विघ्न पड़ रहा था । उनके मन खीज उठा और मन में ये विचार उठा कि ये मर क्यों नही जाती ।
मन में इस विचार के आते ही सभी चिड़ियाँ जमीं पर गिर गयी । शेख फरीद जी घबरा गए, उसी वक्त प्रभु से क्षमा मांगते हुए प्रार्थना कर कहा कि हे प्रभु ये आपने क्या किया । अब आप इन चिड़िओं को जीवित कर दो । इतना सोचना भर था कि सभी चिड़ियाँ चहचहाती हुई उड़ गयी । चिड़ियों को दोबारा जीवित होता देख फरीद जी की ख़ुशी का ठिकाना न रहा ।
इस घटना से फरीद जी के मन में अहंकार आ गया । वे इस घटना का जिक्र अपनी माँ से करने को बेताब हो उठे । और अपनी माँ से मिलने अपने गाँव की ओर चल दिए ।
अपने गाँव के अभी बाहर ही थे, उनकी नज़र अपनी माँ पर पड़ी जो कि कुँए से पानी निकाल कर जमीन पर उन्डेले जा रही थी । वे पास जाकर खड़े हो गए । उन्हें प्यास भी लगी थी । उन्होंने अपनी माँ से पानी पिलाने को (you are reading status update of, "Reading for ever" posted by inder singh). कहा, पर माँ ने फरीद की तरफ कोई ध्यान न दिया । फरीद को माँ का ये व्यवहार अच्छा न लगा । फरीद गुस्से में आ गया । अभी वह कुछ बोलता, उसके बोलने से पहले ही माँ ने कहा, "बेटा, दस चिड़ियाँ मार कर और फिर जिन्दा कर देने से इबादत पूरी न समझ ।" फरीद को झटका लगा कि माँ को ये खबर कैसे लग गयी । फरीद को प्यास लगी थी, पर माँ थी कि पानी कुएं से निकाल कर जमीन पर बहाए जा रही थी । फरीद ने कहा,"थोडा सा पानी तो पिला दो ।"
माँ ने जवाब दिया, "बेटा, पहले अपनी बहन के घर लगी आग बुझा लूं फिर तुझे भी पानी पिला दूँगी ।"
फरीद हैरान हो गया कि जमीन पर पानी फैंकने से इतनी दूर ऊपर पहाड़ी पर मौसी के घर लगी आग कैसे बुझेगी ।
फरीद ने नीचे भिखरते हुए पानी की तरफ देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि पानी ऊपर की तरफ पहाड़ी पर चढ़ता जा रहा था । फरीद ने ऊपर की तरफ देखा तो वहीँ से धुआं उठता दिखाई दिया जहाँ उसकी मौसी का घर था ।
जब धुआं उठाना बंद हुआ तो माँ ने फरीद की तरफ ध्यान दिया ।उसे पानी पिलाया और समझाया कि बिना मुर्शिद(गुरु) के हमारी बंदगी अधूरी ही है । माँ ने फरीद से किसी मुर्शिद की शरण में जाने की सलाह दी । फरीद के पूछने पर माँ ने उसे मुइनुद्दीन चिश्ती साहिब(ख्वाजा गरीब नवाज़) जी के पास जाने की सलाह दी । फरीद चिश्ती साहिब जी के पास पहुँच गया ।
मुर्शद ने फरीद को अपने आश्रम में रहने की इजाजत दे दी । फरीद सेवा में लग गया । सेवा करते करते फरीद को बारह वर्ष हो गए । एक दिन मुर्शिद ने फरीद को बड़े गौर से देखा तो उन्हों ने महसूस कर लिया कि फरीद पात्र साफ़ हो गया था और वह प्रभु कृपा पाने को तैयार था ।
फरीद की सेवायों में एक सेवा यह भी थी कि मुर्शिद के स्नान के लिए पानी लाना और गर्म कर गुरु को नहाने के लिए जगाना ।
एक दिन मुर्शिद ने फरीद को अपने पास बुलाया और इशारों में फरीद को बता दिया कि वे फरीद को कुछ देने जा रहे हैं । फरीद की ख़ुशी का ठिकाना न रहा । फरीद की बंदगी को छत्तीस वर्ष से ऊपर हो चुके थे । इतनी लम्बी बंदगी को फल लगने जा रहे थे ।
फरीद इस घडी का बेसब्री से इंतज़ार करने लगा । एक दिन शाम के समय मुर्शिद ने फरीद से अगले दिन सुबह पूरी तैयारी से आने को कह दिया ।
उस जमाने में माचिस नही हुआ करती थी । आग बचा कर यानी कि जलती हुई रखी जाती थी ।आश्रम में भी आग सदा जलती रहती थी ।
रात के दुसरे पहर शुरू होते ही भयंकर तूफ़ान और बरसात शुरू हो गयी । फरीद लकड़ियों को भीगने से बचाने में लग गया ।
वह लकड़ियाँ भी भीगने से बचा न सका और आग जो सदा जलती रहती थी वह भी बुझ गयी ।
अब फरीद की हालत ख़राब हो गई । उसका मन परेशान हो गया । उसकी आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा । फिर भी उसने हिम्मत से काम लिया । उसने अपने पहनने वाले कपडे, बिछाने वाली चद्दर इत्यादि को इक्कठा किया । पर आग, आग कहाँ मिलेगी, इतनी रात को किसे जगाये ?
फरीद ने दिए में तेल भरा, रुई का फाहा लगाया और आग की तलाश में आश्रम से बाहर निकल पड़ा ।
बरसात थोड़ी धीमी हो गयी थी पर अभी बंद न हुई थी, इस लिए उसने एक हथेली पर दीया रखा और दूसरी हथेली से दीए को ढक लिया ।
थोड़ी दूरी पर एक घर की ऊपर की मंजिल पर उसे एक दीया जलता नजर आया ।
फरीद सीढ़ियाँ चढ़ ऊपर पहुंचा । फरीद ने दरवाज़ा खटखटाया ।
फरीद को नही मालूम था कि वह एक वेश्या का कोठा था ।
कुदरत का खेल कि उस दिन वह खाली बैठी थी । उस दिन उसके पास कोई न आया था ।
फरीद को देखते ही वह खुश हो गयी । वह तो फरीद से भली भांति परिचित थी पर फरीद उसे बिलकुल भी न पहचानता था।
फरीद को देखते ही वह बोली, "आओ फरीद, न जाने कब से तुम्हारी सेवा करने को मन होता था पर तुम हो कि इधर देखते भी नही हो । जाओ हम तुम से न बोलेंगे ।"
फरीद हैरान हो गया कि माजरा क्या है । उसे कुछ समझ न आया ।फरीद को तो आग लेकर वापिस जाने की थी, और वह औरत उसे उलझाने में लगी थी ।
फरीद जल्दी में था । उसने बात अनसुनी करते हुए कहा, "आप अपने जलते हुए दिए में से मेरे दिए को जला दो ।"
औरत ने मजाक करते हुए कहा, "फरीद, इस दुनिया में मुफ्त कुछ नही मिलता, आग चाहिए तो कीमत देनी पड़ेगी ।"
उस औरत को मालूम था कि फरीद के पास कुछ न होता था । वह इसका फायदा उठाने की सोच रही थी ।
फरीद ने पुछा "क्या आप आग की भी कीमत लोगी" ?
उस औरत ने हाँ में जवाब दिया । कुछ सोचते हुए फरीद ने पुछा, "क्या कीमत ?"
औरत ने जवाब दिया, "एक आना(एक रूपये में सोलह आना होते हैं )"।
पंजाबी में आँख की पुतली को आना बोला जाता है ।
जहाँ दिया जल रहा था वहीं पास में ही एक छुरा रखा था(शायद उस औरत ने आत्मरक्षा के लिए रखा होगा) । फरीद । ने झट से उस छुरे को उठाया और अपनी आँख की पुतली को निकाल उस औरत की हथेली पर रख दिया ।
अब वह औरत घबरा गयी । उसे बहुत पश्चाताप हुआ कि उस से एक गुनाह हो गया । उस ने फरीद की मरहम पट्टी की । और फरीद के दीए में आग जला कर दी ।
फरीद के जाने के बाद वह औरत अपने किये पर आंसू बहाती रही और प्रार्थना करती रही ।
दूसरी तरफ फरीद ने अपने कपड़ों को लिया और आग जला कर पानी गर्म कर अपने मुर्शिद को ठीक समय पर उठा दिया ।
मुर्शिद उठे, कमरे से बाहर आते ही फरीद की तरफ देखते हुए पुछा, "फरीद ये आँख पर पट्टी कैसे बंधी है, क्या हुआ ?"
फरीद बात टालते हुए बोला, "जी, आँख आ गयी है ।"
"आँख आ गयी है तो पट्टी खोल दो, अब इसकी क्या जरूरत है ।"
(हकीकत में आँखों के लाल हो जाने को आँख का आ जाना भी कहा जाता है ।)
अब फरीद के मुहं से कोई जवाब न निकला । गुरुदेव से कुछ भी छिपा न था ।
वे उठे और अपने हाथों से फरीद की पट्टी खोलते हुए बोले, "फरीद, मैं रब्ब की बराबरी तो नहीं कर सकता । रब्ब ने तुझे दो आँखे दी, जिसमे से एक चली गयी, अब एक आँख जो तेरी चली गयी, उसकी जगह एक आँख मैं तुझे दे रहा रहा हूँ । ये आँख जो मैं तुझे दे रहा हूँ, ये पहले वाली आँख की बराबरी न कर सकेगी क्योंकि मैं रब्ब से मुकाबला नही कर सकता ।"
जब पट्टी खुली तो जो नई आँख थी वह पहले वाली आँख से छोटी थी ।
बताने वाले बताते हैं कि आज भी फरीद के वंश में जन्म लेने वाले की एक आँख छोटी ही होती है ।

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