बुधवार, 7 जनवरी 2015

१८. शब्दसार को अंग ~ १०

#daduji

॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
.
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
.
*१८. शब्दसार को अंग* 
*देखत देखत देखत मारग,*
*बूझत बूझत बूझत आयौ,* 
*सूझत सूझत सूझ परी सब,*
*गावत गावत गोविन्द गायौ ॥* 
*सोधत सोधत सुद्ध भयौ पुनि,*
*तावत तावत कंचन तायौ ।* 
*जागत जागत जागि पर्यो जब,*
*सुन्दर सुन्दर सुन्दर पायौ ॥१०॥* 
॥ इति शब्द्सार को अंग ॥१८॥ 
तूँने पहले स्वयं शास्त्र - मन्थन कर, तथा फिर गुरु - मुख से श्रवण कर अन्त में भगवत्प्राप्ति का मार्ग - जान ही लिया; 
फिर उस मार्ग के अनुसार साधना करते हुए तूँने उस प्रभु परमात्मा का गुणगान करते करते साक्षात्कार भी कर लिया । 
साथ ही तूँने अपने चित्त को शुद्ध करते हुए उसको दोष एवं विकारों से भी मुक्त कर लिया । जैसे सोने को तपाते तपाते उसको कलंक रहित कर लिया जाता है । 
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - इस प्रकार तूँने पूर्ण सावधान होते हुए उस सुन्दरतम श्रेष्ठ प्रभु को प्राप्त कर ही लिया ॥१०॥ 
॥ शब्दसार को अंग सम्पन्न ॥१८॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें