गुरुवार, 8 जनवरी 2015

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द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध) राग कान्हड़ा ४(गायन समय रात्रि १२ से ३ बजे तक)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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९९. वर्ण भिन्न ताल ~
आव सलौने देखन दे रे, 
बलि बलि जाऊँ बलिहारी तेरे ॥टेक॥
आव पिया तूँ सेज हमारी, 
निसदिन देखूं बाट तुम्हारी ॥१॥
सब गुण तेरे अवगुण मेरे, 
पीव हमारी आह न ले रे ॥२॥
सब गुणवंता साहिब मेरा, 
लाड़ गहेला दादू केरा ॥३॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव कहते हैं कि हे हमारे मन मोहन परमेश्‍वर ! आपके दर्शन हमें अति सलौने सुन्दर लगते हैं । हम विरहीजनों को हृदय में ही, आपका दर्शन दीजिये । हम आपके दर्शन करके, आप पर बार - बार बलिहारी जाते हैं ।
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हे प्रीतम ! आप हमारे अन्तःकरण रूपी सेज पर पधारिये । हम रात दिन, आपके दर्शनों का समय देख रहे हैं ।
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हे नाथ ! आपने तो सब हमारे ऊपर गुण ही गुण किये हैं । वे आपके गुण हम वर्णन नहीं कर सकते और हमने इस मनुष्य शरीर में आकर अवगुण ही अवगुण किये हैं, परन्तु हे पीव ! अब आप हमारी आर्त्त पुकार भी नहीं सुनते हो ।
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हे हमारे हमारे साहिब ! आप तो सब गुणों से सम्पन्न हो । केवल आप अपने आत्मीयजनों को ही प्यार करके अपनी शरण में लेते हो ।
(क्रमशः)

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