॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*१८. शब्दसार को अंग*
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*कार उहै अविकार रहै नित,*
*सार उहै जु असार हि नाखै ।*
*प्रीति उहै जु प्रतीति धरै उरि,*
*नीति उहै अनीति न भाखै ॥*
*तंत उहै लगि अंत न टूटत,*
*संत उहै अपनौ सत राखै ।*
*नाद उहै सुनि बाद तजै सब,*
*स्वाद उहै रस सुन्दर चाखै ॥६॥*
'कार्य' वही है जो किये जाने के बाद सदा निर्विकार सिद्ध रहे । तथा 'सार' वही कहलाता है जो निःसार तत्व को दूर हटा दे ।
'प्रीति' उसे ही कहा जा सकता है जो हृदय में विश्वास उत्पन्न कर सके तथा 'नीतिवचन' वे ही समझते हैं जो अनीति को दूर हटाये रखें ।
'तन्तु' उसे ही समझना चाहिए जो अन्त तक न टूटे, तथा 'सन्त' उसे कहते हैं जो सत्य व्रत का पालन करे ।
'शब्द'(नाद) वही कहलाता है जिसे सुनने के बाद श्रोता को अन्य नादों से छुटकारा मिल जाय, 'स्वाद' उसे ही मानना चाहिये जो जब भी चखा जाय सदा मधुर रसमय ही लगे -ऐसा ही *श्री सुन्दरदास जी* का मानना है ॥६॥
(क्रमशः)

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