मंगलवार, 6 जनवरी 2015

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द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध) राग कल्याण ३(गायन समय संध्या ६ से ९ रात्रि)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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९७. परिचय । त्रिताल ~
जग सौं कहा हमारा, 
जब देख्या नूर तुम्हारा ॥टेक॥
परम तेज घर मेरा, 
सुख सागर माहिं बसेरा ॥१॥
झिलमिल अति आनन्दा, 
तहँ पाया परमानन्दा ॥२॥
ज्योति अपार अनन्ता, 
खेलें फाग बसन्ता ॥३॥
आदि अंत अस्थाना, 
जन दादू सो पहचाना ॥४॥
इतिराग कल्याण सम्पूर्णः ॥३॥पद २॥

टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव कहते हैं कि हे परब्रह्म स्वरूप परमेश्‍वर ! जब हमने आपको अपना आत्म - स्वरूप करके अनुभव द्वारा पहचान लिया, तो फिर इस मिथ्या - जगत से हमारा क्या प्रयोजन है ?
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आपका जो शुद्ध तेजोमय स्वरूप है, अब तो वही हमारा घर है । आपका जो स्वरूप व्यापक चैतन्य सुखरूप है, उसी में हम वास करते है ।
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जहाँ जीव - ब्रह्म की एकता रूप ज्ञान - ज्योति का झिलमिलाहट रूप आनन्द हो रहा है, रोम - रोम में आपका दर्शन कर रहे हैं । इस प्रकार हृदय - प्रदेश में ही परम आनन्द को प्राप्त हो रहे हैं ।
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हे अनन्त ! आपकी अपार ज्ञान रूप ज्योति के प्रकाश में हम, पारमार्थिक जनों की भाँति, बसन्त रूप आनन्द उत्सव मना रहे हैं ।
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जो आप सबके आदि और अन्त स्वरूप हैं, ऐसे आपके स्वरूप को हमने अन्तर्मुख - वृत्ति द्वारा पहचान लिया है । इति राग कल्याण टीका सहित, सम्पूर्णः ॥३॥पद २॥

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