बुधवार, 7 जनवरी 2015

*त्रिपोलिया प्रसंग से आगे ~*


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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*त्रिपोलिया प्रसंग से आगे ~*
दूसरे दिन राजा त्रिपोलिया पर दर्शन करने गये तब साथ में उनके चार भाई भी थे । वैरी साल(दुर्जन साल) गुढ़ावालों ने दादूजी ने पू़छा - भगवन् ! काल कब आता है ?
तब दादूजी ने १५७ का पद -
१५७. चौताल
आदि काल अंत काल, मध्य काल भाई ।
जन्म काल जुरा काल, काल संग सदाई ॥टेक॥
जागत काल सोवत काल, काल झंपै आई ।
काल चलत काल फिरत, कबहूँ ले जाई ॥१॥
आवत काल जावत काल, काल कठिन खाई ।
लेत काल देत काल, काल ग्रसै धाई ॥२॥
कहत काल सुनत काल, करत काल सगाई ।
काम काल क्रोध काल, काल जाल छाई ॥३॥
काल आगै काल पीछैं, काल संग समाई ।
काल रहित राम गहित, दादू ल्यौ लाई ॥४॥
से उत्तर दिया था ।
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फिर मनोहरदास मढ़ावालों ने पु़छा - भगवन् ! प्रभु प्राप्ति का यथार्थ ज्ञान मुझे बताने की कृपा करिये ? मैं इस पथ का पथिक हूँ । अतः अपना अनुभूत हो वही कहैं ? उक्त प्रश्‍न सुनकर दादूजी ने १५० का पद -
१५०. समुच्चय उत्तर । राज विद्याधर ताल
पंथीड़ा पंथ पिछाणी रे पीव का, गहि विरहे की बाट ।
जीवत मृतकह्वै चले, लंघे औघट घाट, पंथीड़ा ॥टेक॥
सतगुरु सिर पर राखिये, निर्मल ज्ञान विचार ।
प्रेम भक्ति कर प्रीत सौं, सन्मुख सिरजनहार, पंथीड़ा ॥१॥
पर आतम सौं आत्मा, ज्यों जल जलहि समाइ ।
मन हीं सौं मन लाइये, लै के मारग जाइ, पंथीड़ा ॥२॥
तालाबेली ऊपजै, आतुर पीड़ पुकार ।
सुमिर सनेही आपणा, निशदिन बारम्बार, पंथीड़ा ॥३॥
देखि देखि पग राखिये, मारग खांडे धार ।
मनसा वाचा कर्मणा, दादू लंघे पार, पंथीड़ा ॥४॥
उक्त उपदेश सुनकर मनोहरदास का संशय दूर होने से वे अति प्रसन्न हुये थे ।

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