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साभार ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*त्रिपोलिया प्रसंग से आगे ~*
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तीसरे दिन राजा नारायणसिंह के साथ अमरसिंह सालीवाले, केशवदास आकोदावाले, गैंदीदास आदसवावाले, और तिलोकदास ममाणावाले भी थे । अमरसिंह ने दादूजी से पू़छा - भगवन् ! राम विमुख और सम्मुख मानवों की क्या गति होती है ? दादूजी ने ५१ का पद कहा -
५१. संजीवनी । पंचम ताल
राम विमुख जग मर मर जाइ, जीवैं संत रहैं ल्यौ लाइ ॥टेक॥
लीन भये जे आतम रामा, सदा सजीवन कीये नामा ॥१॥
अमृत राम रसायन पीया, तातैं अमर कबीरा कीया ॥२॥
राम राम कह राम समाना, जन रैदास मिले भगवाना ॥३॥
आदि अंत केते कलि जागे, अमर भये अविनासी लागे ॥४॥
राम रसायन दादू माते, अविचल भये राम रंग राते ॥५॥
अपने प्रश्न का उत्तर सुनकर अमरसिंह अति प्रसन्न हुये ।
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फिर केशवदास ने पू़छा - भगवन् ! मानव तन व्यर्थ क्षीण होने में मूल कारण क्या है ? तब दादूजी ने ४४ का पद कहा -
४४. उपदेश चेतावनी । पंचम ताल
मेरी मेरी करत जग खीना, देखत ही चल जावै ।
काम क्रोध तृष्णा तन जालै, तातैं पार न पावै ॥टेक॥
मूरख ममता जन्म गमावै, भूल रहे इहिं बाजी ।
बाजीगर को जानत नांही, जन्म गंवावै वादी ॥१॥
प्रपंच पंच करै बहुतेरा, काल कुटुम्ब के तांई ।
विषै के स्वाद सबै ये लागे, तातैं चीन्हत नांही ॥२॥
येता जिय में जानत नांहीं, आइ कहाँ चल जावै ।
आगे पीछे समझै नांहीं, मूरख यूं डहकावै ॥३॥
ये सब भ्रम भान भल पावै, शोध लेहु सो साँई ।
सोई एक तुम्हारा साजन, दादू दूसर नांही ॥४॥
उक्त पद सुनकर केशवदास अति प्रसन्न हुये और प्रणाम करके बोले आपका कथन यथार्थ है ।

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