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*#श्रीदादूदयालवाणी०आत्मदर्शन*
द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध) राग माली गौड़ २(गायन समय दिन ६ से ९)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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९५. वस्तु निर्देश । चौताल ~
निर्मल तत्त निर्मल तत्त निर्मल तत्त ऐसा ।
निर्गुण निज निधि निरंजन, जैसा है तैसा ॥टेक॥
उतपत्ति आकार नांही, जीव नांही काया ।
काल नांही कर्म नांही, रहिता राम राया ॥१॥
शीत नांही घाम नांही, धूप नांही छाया ।
बाव नांही वर्ण नांही, मोह नांही माया ॥२॥
धरणी आकाश अगम, चंद सूर नांही ।
रजनी निशि दिवस नांही, पवना नहीं जांही ॥३॥
कृत्रिम घट कला नांही, सकल रहित सोई ।
दादू निज अगम निगम, दूजा नहीं कोई ॥४ ॥
इति राग माली गौड़ सम्पूर्ण ॥ २ ॥ पद २६ ॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव जिज्ञासुओं को परब्रह्म रूप सत्य वस्तु का निर्देश कर रहे हैं कि वह निर्गुण परब्रह्म परमेश्वर, निर्मल कहिए सत्य चित् आनन्द स्वरूप, माया के आवरण से रहित है, फिर वह निर्गुण निज सबका आत्मस्वरूप निधि समूहरूप निरंजन, माया अंजन रहित, जैसा उसका स्वरूप है, वैसा ही ब्रह्मनिष्ठ पुरुषों ने अनुभव किया है ।
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न तो जिसकी कभी उत्पत्ति होती है, न उसका कोई आकार ही है । न उसमें जीव भाव ही है और न माया रूप काया ही है । न उसमें किसी प्रकार के काल की गति ही पहुँचती है । न किसी प्रकार के कर्मों का लेप ही लगता है । इन सबसे रहित, वह सबके राजा रूप राम हैं ।
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उसके स्वरूप में सर्दी, गर्मी, धूप छाया अर्थात् सुख दुःख, वह इन सब विकारों से रहित हैं । उनके स्वरूप में न तो वायु है, न वर्ण - काला, गोरा, ब्राह्मण, क्षत्रिय, और न माया और माया का कार्य मोह आदि ही है और...
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न धरती, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य ही है, इन सबसे वह अगम हैं । न उनके स्वरूप मैं रात्रि रूप अज्ञान ही है, और न दिन रूप ज्ञान ही है न प्राणों की गति ही पहुंचती है ।
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माया रचित घट आदि कृत्रिम, किसी प्रकार की भी उसमें कोई कला नहीं है । वह सम्पूर्ण नामरूप प्रपंच से रहित, वही तुम्हारा निज आत्म - स्वरूप साक्षी ब्रह्म है । ‘निगम’= वेद, ‘अगम’= शास्त्र भी, उसको लक्षणावृत्ति द्वारा, निज स्वरूप करके ही बोध कराते हैं ।
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“न जामते प्रियतो वा कदाचित्,
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो,
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥” - गीता
यह परमात्मा स्वरूप आत्मा न जन्मता और न मरता है, क्योंकि यह अजन्मा है, नित्य है, शाश्वत और पुरातन है । शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता ।
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इति राग माली गौड़ टीका सहित सम्पूर्ण ॥२॥पद २६॥
(क्रमशः)
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द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध) राग माली गौड़ २(गायन समय दिन ६ से ९)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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९५. वस्तु निर्देश । चौताल ~
निर्मल तत्त निर्मल तत्त निर्मल तत्त ऐसा ।
निर्गुण निज निधि निरंजन, जैसा है तैसा ॥टेक॥
उतपत्ति आकार नांही, जीव नांही काया ।
काल नांही कर्म नांही, रहिता राम राया ॥१॥
शीत नांही घाम नांही, धूप नांही छाया ।
बाव नांही वर्ण नांही, मोह नांही माया ॥२॥
धरणी आकाश अगम, चंद सूर नांही ।
रजनी निशि दिवस नांही, पवना नहीं जांही ॥३॥
कृत्रिम घट कला नांही, सकल रहित सोई ।
दादू निज अगम निगम, दूजा नहीं कोई ॥४ ॥
इति राग माली गौड़ सम्पूर्ण ॥ २ ॥ पद २६ ॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव जिज्ञासुओं को परब्रह्म रूप सत्य वस्तु का निर्देश कर रहे हैं कि वह निर्गुण परब्रह्म परमेश्वर, निर्मल कहिए सत्य चित् आनन्द स्वरूप, माया के आवरण से रहित है, फिर वह निर्गुण निज सबका आत्मस्वरूप निधि समूहरूप निरंजन, माया अंजन रहित, जैसा उसका स्वरूप है, वैसा ही ब्रह्मनिष्ठ पुरुषों ने अनुभव किया है ।
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न तो जिसकी कभी उत्पत्ति होती है, न उसका कोई आकार ही है । न उसमें जीव भाव ही है और न माया रूप काया ही है । न उसमें किसी प्रकार के काल की गति ही पहुँचती है । न किसी प्रकार के कर्मों का लेप ही लगता है । इन सबसे रहित, वह सबके राजा रूप राम हैं ।
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उसके स्वरूप में सर्दी, गर्मी, धूप छाया अर्थात् सुख दुःख, वह इन सब विकारों से रहित हैं । उनके स्वरूप में न तो वायु है, न वर्ण - काला, गोरा, ब्राह्मण, क्षत्रिय, और न माया और माया का कार्य मोह आदि ही है और...
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न धरती, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य ही है, इन सबसे वह अगम हैं । न उनके स्वरूप मैं रात्रि रूप अज्ञान ही है, और न दिन रूप ज्ञान ही है न प्राणों की गति ही पहुंचती है ।
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माया रचित घट आदि कृत्रिम, किसी प्रकार की भी उसमें कोई कला नहीं है । वह सम्पूर्ण नामरूप प्रपंच से रहित, वही तुम्हारा निज आत्म - स्वरूप साक्षी ब्रह्म है । ‘निगम’= वेद, ‘अगम’= शास्त्र भी, उसको लक्षणावृत्ति द्वारा, निज स्वरूप करके ही बोध कराते हैं ।
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“न जामते प्रियतो वा कदाचित्,
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो,
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥” - गीता
यह परमात्मा स्वरूप आत्मा न जन्मता और न मरता है, क्योंकि यह अजन्मा है, नित्य है, शाश्वत और पुरातन है । शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता ।
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इति राग माली गौड़ टीका सहित सम्पूर्ण ॥२॥पद २६॥
(क्रमशः)

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