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द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध) राग कान्हड़ा ४(गायन समय रात्रि १२ से ३ बजे तक)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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१००. पंचम ताल ~
आव पियारे मींत हमारे,
निशदिन देखूं पाँव तुम्हारे ॥टेक॥
सेज हमारी पीव सँवारी,
दासी तुम्हारी सो धन वारी ॥१॥
जे तुझ पाऊँ अंग लगाऊँ,
क्यों समझाऊँ वारणें जाऊँ ॥२॥
पंथ निहारूं बाट सँवारूं,
दादू तारूं तन मन वारूं ॥३॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव कहते हैं कि हे परमेश्वर ! आप ही हमारे, हितैषी मित्र हो । इस हृदय में आप प्रगट होइये । हम रात दिन आपके तेजपुंज रूप चरणों के दर्शनों के लिये, ध्यान कर रहे हैं ।
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हे प्रीतम ! हमने हृदय रूपी सेज, आपके दर्शनों के लिये, देवी सम्पत्ति रूप गुणों से सजाई है । हम आपकी ही, विरहीजन दासी, दासातन भक्ति धारण किये हुए हैं । और आपके बार - बार वारणै जाते हैं ।
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हे प्रीतम ! हम आपको हृदय रूपी सेज पर प्राप्त करें, तो अपना धन्य भाग्य समझें और आपके स्वरूप में हम अपने जीव को अभेद करैं । हे नाथ ! अब हम आपको कैसे समझावैं ? आप तो सब ही विरहीजनों की हालत जानते हैं । हम तो आपके बार - बार वारणै जाते हैं । अपने आपको, आपके ऊपर न्यौछावर किये हैं ।
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आपके दर्शनों का पंथ देख रहे हैं और मनुष्य जन्म की सार्थकता रूप साधनों को, धारण कर रहे हैं । हे प्रभु ! इस प्रकार हम अपने तन मन को, आपके ऊपर न्यौछावर करते हैं । आप ही हमें संसार समुद्र से तारैंगे ।
(क्रमशः)

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