#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः॥
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*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*१९. सूरातन को अंग*
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*जूझिये कौ चाब जाकै ताकि ताकि करै घाव,*
*आगै धरि पांव फिरि पीछैं न संभारि है ।*
*हाथ लिये हथियार तीक्षण लगायौ धार,*
*बार नहिं लागै सब पिशुन प्रहारि है ॥*
*वोट नहिं राखै कछु लोट पोट होइ जाइ,*
*चोट नहिं चुकै, सीस रिपु कौ उतारि है ।*
*सुन्दर कहत ताहि नैकु नहिं सोच पोच,*
*ऐसौ शूरवीर धीर मीर जाइ मारि है ॥५॥*
*युद्धवीर की निर्भयता* : जिस के मन में युद्ध में सम्मिलित होने की प्रबल लालसा है, जो लक्ष्य बना कर शत्रुदल को क्षत विक्षत करता है, जो अपने कदम आगे बढ़ा कर पीछे नहिं लौटाता है ।
हाथ में अस्त्र शस्त्र लिये हुए, जिन पर तीखी धार लगी हुई है(जो सर्वथा नये हैं), उन से आक्रमण करने में कुछ भी विलम्ब नहीं लगाता ।
वह अपनी रक्षा का कोई कृत्रिम उपाय नहीं करता, वह युद्ध क्षेत्र में ही उठता, गिरता, पड़ता रहता है; परन्तु शत्रु पर प्रहार करने में प्रमाद(भूल) नहीं करता, वह वीर अन्त में शत्रु का शिर धड़ से पृथक् कर ही देता है ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - ऐसे शूर वीर को युद्ध का कुछ भी भय नहीं होता । वह धैर्यवान् वीर योद्धा उस युद्ध में राजाओं का शिर काटने में भी कोई संकोच नहीं करता ॥५॥
(क्रमशः)

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