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द्वितीय भाग : शब्दभाग(उत्तरार्ध) राग कान्हड़ा ४(गायन समय रात्रि १२ से ३ बजे तक)
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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९८. विरह विनती । वर्ण भिन्नताल
दे दर्शन देखन तेरा, तो जिय जक पावै मेरा ॥टेक॥
पीव तूँ मेरी वेदन जानै,
हौं कहाँ दुराऊं छानै, मेरा तुम देखे मन मानै ॥१॥
पीव करक कलेजे मांही,
सो क्योंही निकसै नांही, पीव पकर हमारी बांही ॥२॥
पीव रोम रोम दुख सालै,
इन पीरों पिंजर जालै, जीव जाता क्यों ही बालै ॥३॥
पीव सेज अकेली मेरी,
मुझ आरति मिलणै तेरी, धन दादू वारी फेरी ॥४॥
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टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव, इसमें विरह का स्वरूप दर्शाते हैं कि हे परमेश्वर ! अब हम विरहीजनों को आपका दर्शन करने दो, तभी हमारे को अन्तःकरण में शान्ति प्राप्त होगी ।
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हे नाथ ! आप हमारे विरह के दुःख को जानते हो । मैं आपसे, इस विरह के दर्द को कहाँ छिपा सकती हूँ ? अब तो हमारा मन अति व्याकुल हो रहा है । जब आपका दर्शन करें, तब ही हमारा मन सन्तुष्ट होवे ।
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हमारे कलेजे में यह विरह का दुःख, बार - बार कचोट रहा है । यह दुःख हमारे कलेजे में आपके दर्शनों के बिना, कभी भी शान्त नहीं होता । हे प्रीतम प्यारे परमेश्वर ! अब आप हमारी बाँह पकड़कर, हमें अपनी शरण में लीजिये ।
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हे पीव ! यह आपका वियोग रूपी, विरह का दर्द हमारे रोम - रोम में व्याप्त हो रहा है । हे नाथ ! यह विरह की पीड़ा, हमारे शरीर को जला रही है । हमारा जीव आपके वियोग में इस शरीर से निकलने वाला है । अब आप दर्शन देकर, इसको बचाइये ।
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हे परमेश्वर ! हमारी हृदय रूपी सेज आपके बिना सूनी दिखाई पड़ती है । आपके मिलने को हम अति दुःखी हैं । उन विरहीजन भक्तों को धन्य है, जो आपका साक्षात्कार दर्शन करते हैं । हम उनके वारणै जाते हैं ।
(क्रमशः)

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