रविवार, 3 मई 2015

*= बनवारीजी को उपदेश(३) =*

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-१)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज,
पुष्कर, राजस्थान ।*
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*~ एकादश विन्दु ~*
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*= बनवारीजी को उपदेश(३) =*
अविनाशी संग आतमा, रमे हो रैण दिन राम ।
एक निरंतर ते भजैं, हरि हरि प्राणी नाम ॥टेक॥
सदा अखंडित उर बसे, सो मन जाणी ले ।
सकल निरंतर पूरि सब, आतम रातो ते ॥१॥
निराधार निज बैसणों, तिहिं तत आसन पूर ।
गुरु शिष आनन्द ऊपजे, सन्मुख सदा हजूर ॥२॥
निश्चल ते चाले नहीं, प्राणी ते परिमाण ।
साथी साथैं ते रहैं, जाणैं जाण सुजाण ॥३॥
ते निर्गुण आ गुणधरी, मांहीं कौतिक हार ।
देह अछत अलगो रहै, दादू सेव अपार ॥४॥
अर्थ: - जो हरि हरि उच्चारण करते हुये निरंतर एक अविनाशी राम को भजते हैं, उनकी बुद्धि रात्रि - दिन उस राम में ही रमण करती है । जो सदा अखंडित भाव से हृदय में बसता है, उसी को साधन सम्पन्न मन से जानकार प्राप्त करले । जो निरंतर सब में परिपूर्ण है, उसी में हमारा जीवात्मा अनुरक्त है । जब उस निराधार निज स्वरूप तत्त्व में स्थिति रूप आसन लगाकर बैठना होता है, तब ब्रह्म तत्त्व सदा सन्मुख उपस्थित भासता है और गुरु शिष्य दोनों के हृदय में ब्रह्मानन्द उत्पन्न होता
है ।
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वे साधक संयम रूप माप से स्वरूप में निश्चल रहते हैं, उनकी वृत्ति विषयों में नहीं जाती । वे बुद्धिमान ज्ञानद्वारा जानकार अपने सदा के साथी परब्रह्म के साथ ही रहते हैं । वे गुण विस्तार वाली माया को त्याग कर सत्तामात्र से संसार रूप खेल रचने वाले निर्गुम ब्रह्म में ही स्थित रहते हैं । इस प्रकार उस असीम प्रभु की उपासना करके शरीर में रहते हुये भी शरीराध्यास से अलग ही रहते हैं ।
(क्रमशः)

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