#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
दादू अनुभव उपजी गुणमयी, गुण ही पै ले जाइ ।
गुण ही सौं गहि बंधिया, छूटै कौन उपाइ ॥
आत्म उपज आकाश की, सुनि धरती की बाट ।
दादू मारग गैब का, कोई लखै न घाट ॥
आत्म बोधी अनुभवी, साधु निर्पख होइ ।
दादू राता राम सौं, रस पीवेगा सोइ ॥
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साभार : सर्वज्ञ शङ्करेन्द्र ~
"सुनना और चिन्तन करना ?"
सुना हुआ विस्मृत हो जाता है ।
जब स्वयं चिन्तन करते हैं तो वह ह्रदय का -
रासायनिककरण करता है ।
और जीवन - कर्म - चरित्र सबको बदल देता है ।
- नारायण हरिः —

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