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॥ दादूराम सत्यराम ॥
भाई रे घर ही में घर पाया ।
सहज समाइ रह्यो ता मांही, सतगुरु खोज बताया ॥टेक॥
ता घर काज सबै फिर आया, आपै आप लखाया ।
खोल कपाट महल के दीन्हें, स्थिर सुस्थान दिखाया ॥१॥
भय औ भेद भरम सब भागा, साच सोई मन लाया ।
पिंड परे जहाँ जिव जावै, ता में सहज समाया ॥२॥
निश्चल सदा चलै नहिं कबहूँ , देख्या सब में सोई ।
ताही सौं मेरा मन लागा, और न दूजा कोई ॥३॥
आदि अनन्त सोई घर पाया, अब मन अनत न जाई ।
दादू एक रंगै रंग लागा, तामें रह्या समाई ॥४॥
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साभार : राधा शरण दास ~
किसी ने मिलने पर पूछा कि कहाँ से आ रहे हो? दास ने उत्तर दिया-"धर्मशाला से"। उन्होंने परिहास-व्यंग से बुद्धि का प्रयोग कर कहा-"अच्छा ! बहुत दूर से ! धर्मशाला तो हिमाचल प्रदेश में है !"
दास ने उत्तर दिया कि दास के लिये "धर्मशाला" का अर्थ यह भौतिक संसार है; यहाँ दास का "घर" नहीं है; न ही दास यहाँ का है, न ही होना चाहता है। यहाँ तो कुछ दिनों का ठहराव है किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति हेतु ! किन्तु यहाँ "घर" नहीं बनाना है; मुझे तो लौटना है, जहाँ से आया हूँ, वापस अपने "घर" ! अपने "प्रियजन" के समीप !
यही तो स्मरण रखना है कि हम कहाँ से आये हैं; और यहाँ कब तक और क्यूँ हैं। यहाँ "घर" मत बना लेना। यात्रा में कम से कम वस्तुओं का भार ताकि असुविधा न हो। कुछ दिन ठहरना है फ़िर छोड़कर चल देना है। यहाँ "घर" बना लिया तो लौट न सकोगे क्यूँकि दास ने अनुभव किया है कि जिसने भी घर बना लिया, वह बँधन में आ गया। कहीं जाने की कहो तो उत्तर मिलता है कि "घर" को खाली छोड़कर कैसे जावें ! किन्तु "घर" तो छूटेगा ही ! राजी-राजी, गैर-राजी ! आये थे हरि-भजन को, ओटन लगे कपास !
जय जय श्री राधे !
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