शनिवार, 2 मई 2015

= १४१ =

#daduji
॥ दादूराम सत्यराम ॥
दादू डोरी हरि के हाथ है, गल मांही मेरे ।
बाजीगर का बांदरा, भावै तहाँ फेरे ॥
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साभार : @www.bhaskar.com ~

एक बार सभी सखियों ने बांसुरी से कहा - हे बांसुरी ! तुमने ऐसी कौन सी तपस्या की है, कि तुम श्याम सुन्दर के होठों से लगी रहती हो, उनका वो मधुर अधरामृत पान करती रहती हो, जब वे तुम्हें बजाते हैं तो मानो तुम उन्हें अपने इशारों पर नचाती हो, एक पैर पर खड़ा रखती हो, वे अपने हाथों के पलंग पर तुम्हें सुलाते हैं, होठों का तकिया लगाते हैं.
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और जब उनकी उंगलियाँ तुम पर चलती हैं, तो मानो तुम्हरे चरण दबा रहे हों, और जब हवा चलती है तो उनके घुंघराले केश हिलते हैं, तो मानो तुम्हे पंखा कर रहे हों, कितनी सेवा करते हैं तुम्हारी ! वंशी का यदि हम उल्टा करें तो होता है "शिव" ये वांसुरी शिव ही है, भगवान शिव जैसे बनो शांत मीठा बोलने वाले, बांसुरी भगवान श्रीकृष्ण को अति प्रिय है क्योंकि बांसुरी में तीन गुण हैं - 
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पहला “वांसुरी में गांठ नहीं है” पोली है मानो हमें बता रही है कि अपने अंदर किसी भी प्रकार कि गाँठ मत रखो. चाहे कोई तुम्हरे साथ कैसा भी करे बदले की भावना मत रखो.
दूसरा "बिना बजाये बजती नहीं है" मानो बता रही है कि जब तक ना कहा जाये तब तक मत बोलो, बोल बड़े कीमती हैं बुरा बोलने से अच्छा है शांत रहो. 
और तीसरा "जब भी बजती है मधुर ही बजती है" मानो बता रही है कि जब भी बोलो तो मीठा ही बोलो जब ऐसे गुण किसी में भगवान देखते हैं तो उसे उठाकर अपने होठों से लगा लेते हैं. 
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एक बार राधाजी ने बांसुरी से पुछा - हे प्रिय बांसुरी यह बताओ कि मैं कृष्णजी को इतना प्रेम करती हूँ, फिर भी कृष्णजी मुझसे अधिक तुमसे प्रेम करते हैं. तुम्हें अपने होठों से लगाये रखते हैं. इसका क्या कारण है ??? - 
बांसुरी ने कहा ! मैंने अपने तन को कटवाया, फिर से काट-काट कर अलग की गई.
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फिर मैंने अपना मन कटवाया, मतलाब बीच में से बिलकुल आर-पार पूरी खाली कर दी गई. फिर अंग-अंग छिदवाया, मतलब मुझ में अनेकों छिद्र कर दिए गए. उसके बाद भी मैं वैसे ही बजी जैसे कृष्णजी ने मुझे बजाना चाहा ! मैं अपनी इच्छा से कभी नहीं बजी ! यही अंतर है. मैं कृष्णजी की इच्छा से चलती हूँ और तुम कृष्णजी को अपनी इच्छा से चलाना चाहती हो !
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बांसुरी ने सभी से कहा - ''आप मेरी तरह बन जाइए फिर समझ आएगा के श्रीकृष्ण मुझसे इतना प्यार क्यों करते हैं? मुझे देखिये मेरा आकर सीधा साधा और एक मार्ग है ना कोई मोड़ न अलग रास्ता, मैं अंदर निर्मल और खाली हूँ उस खाली जगह से मेरा पूरा अहंकार नष्ट हो चुका है, मुझ पर सुर निकालने के लिए सात गोल द्वार हैं जिनसे काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, मत्सर और अविद्या निकाले जा चुके हैं.

बांसुरी के लिए लगने वाला बांस तिथि देखकर ही तोडा जाता है. पंचमी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी और दशमी के दिन बांसुरी के लिए बांस तोडा नहीं जाता है इसका कारण ये है के इन दिनों के अंत में 'मी' शब्द आता है 'मी' याने मैं और मैं याने अहंकार, इससे विनाश होता है.
बारह उंगली लम्बी और छः छिद्र वाली होती है वेणु, 
दो हाथ लम्बी और पांच छिद्र वाली होती है मुरली, 
सत्रह उंगली लम्बी और नौ छिद्र वाली होती है वंशी, 
मणिमय वंशी का नाम सम्मोहनी है, 
स्वर्णमय वंशी का नाम आकर्षिणी है, 
बांस की वंशी का नाम आनंदिनी है.
बोल बांसुरी वारे की जय ....

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