शनिवार, 2 मई 2015

२४. स्वरूप बिस्मरण को अंग ~ १५


#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः॥ 
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)* 
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व 
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
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*२४. स्वरूप बिस्मरण को अंग* 
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*आपु ही चैतन्य यह इंद्रिनि चेतनि करि,*
*आपु ही मगन होइ आनन्द बढ़ायौ है ।*
*जैसैं नर शीत काल सोवत निहालि ओढि,*
*आपु ही तपत करि आपु सुख पायौ है ।*
*जैसैं बाल लकरी कौ घौरा करि डांकि चढ़ै,*
*आप असवारि होइ आप ही कुदायौ है ।*
*तैसें ही सुन्दर यह जड़ कौ संयोग पाइ,*
*पर सुख आपु मांनि, आपु ही भुलायौ है ॥१५॥*
*इन्द्रियसुख को आत्मसुख मानना* : यह चेतन आत्मा इन्द्रियों को चेतन मान कर उनके द्वारा संसार में आसक्त होकर विषयों का आनन्द लेता है ।
जैसा कोई पुरुष शीत ॠतु में स्वयं रजाई(निहाली) ओढ़ कर, स्वयं ही गर्म होकर सुखानुभव करता है । 
जैसे कोई बालक लकड़ी के घोड़े पर स्वयं चढ़कर स्वयं उसको चलाता है, तथा उससे आनन्दित होता है । 
इसी तरह *श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - यह चेतन आत्मा जड़(इन्द्रियों) से संयुक्त होकर उनसे प्राप्त सुख मानता हुआ आत्मस्वरूप को भूल बैठा है ॥१५॥ 
(क्रमशः)

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