#daduji
|| श्री दादूदयालवे नमः ||
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
.
*= २५ . सांख्य ज्ञांन को अंग =*
. *क्षीर नीर मिलि दोऊ एकठे ई होइ रहे,*
*नीर छाड़ि हंस जैसैं क्षीर कौ गहतु है ।*
*कंचन मैं और धात मिलि कर बांन पर्यौ,*
*शुद्ध कर कंचन सुनार ज्यौं लहतु है ॥*
*पावक हु दार मधि दार ही सौ होइ रह्यौ,*
*मथि कर काढै सोई दार कौं दहतु है ।*
*तैसैं ही सुन्दर मिल्यौ आतमा अनातमा, जू,*
*भिन्न भिन्न करिये सु सांख्य यौं कहतु है ॥२३॥*
दूध और जल दोनों मिलकर एक साथ रहते हैं, उनमें हंस जल का त्याग कर दूध को ग्रहण कर लेता है ।
इसी प्रकार, कुशल सुवर्णकार सोने में किसी अन्य धातु के मिश्रण को दूर कर शुद्ध सुवर्ण ग्रहण कर लेता है ।
इसी प्रकार अग्नि काष्ठ में काष्ठसम होकर रहता है, उसे कोई कुशल मनुष्य अरणिमन्थन पद्धति से पृथक् कर लेता है ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - इसी प्रकार आत्म एवं अनात्म पदार्थों को पृथक् पृथक् कर लेना चाहिये - ऐसा सांख्यशास्त्र का मानना है ॥२३॥
(क्रमशः)
|| श्री दादूदयालवे नमः ||
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= २५ . सांख्य ज्ञांन को अंग =*
. *क्षीर नीर मिलि दोऊ एकठे ई होइ रहे,*
*नीर छाड़ि हंस जैसैं क्षीर कौ गहतु है ।*
*कंचन मैं और धात मिलि कर बांन पर्यौ,*
*शुद्ध कर कंचन सुनार ज्यौं लहतु है ॥*
*पावक हु दार मधि दार ही सौ होइ रह्यौ,*
*मथि कर काढै सोई दार कौं दहतु है ।*
*तैसैं ही सुन्दर मिल्यौ आतमा अनातमा, जू,*
*भिन्न भिन्न करिये सु सांख्य यौं कहतु है ॥२३॥*
दूध और जल दोनों मिलकर एक साथ रहते हैं, उनमें हंस जल का त्याग कर दूध को ग्रहण कर लेता है ।
इसी प्रकार, कुशल सुवर्णकार सोने में किसी अन्य धातु के मिश्रण को दूर कर शुद्ध सुवर्ण ग्रहण कर लेता है ।
इसी प्रकार अग्नि काष्ठ में काष्ठसम होकर रहता है, उसे कोई कुशल मनुष्य अरणिमन्थन पद्धति से पृथक् कर लेता है ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - इसी प्रकार आत्म एवं अनात्म पदार्थों को पृथक् पृथक् कर लेना चाहिये - ऐसा सांख्यशास्त्र का मानना है ॥२३॥
(क्रमशः)

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