卐 सत्यराम सा 卐
*मुझ ही मैं मेरा धणी, पड़दा खोलि दिखाइ ।*
*आत्म सौं परमात्मा, प्रकट आण मिलाइ ॥४३॥*
टीका ~ हे दयामूर्ते ! यदि मेरा मालिक मेरे अन्दर ही है, तो "पड़दा'' कहिये अविद्या अन्धकार को हटा करके आत्मसाक्षात्कार कराओ । हे सतगुरो ! आप दयालु हो, इसलिए मेरे चित्त को प्रभु भक्ति में एकाग्र करके, सर्वव्यापक प्रभु का साक्षात्कार कराइए एवं अपरोक्ष रूप से मुझ अज्ञानी को प्रत्यक्ष दर्शन कराइए ॥४३॥
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*भरि भरि प्याला, प्रेम रस, अपणे हाथ पिलाइ ।*
*सतगुरु के सदिकै किया, दादू बलि बलि जाइ ॥४४॥*
टीका ~ हे गुरुदेव ! मैं तन, मन, धन, वचन, आदि आपके भेंट करता हूँ और मैं आपकी बारंबार वन्दना करता हूँ । क्यों ? किस लिए ? "भरि भरि प्याला प्रेम रस अपणे हाथ पिलाइ"- अर्थात् अपने हित भावनारूपी हाथों से प्रेमरूपी प्याला रामरस से भर-भर कर बारंबार पिलाइए । यही आपसे प्रार्थना है ॥४४॥
*(#श्रीदादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*

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