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॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
२४१. गुरु ज्ञान । वर्ण भिन्न ताल ~
मेरा गुरु ऐसा ज्ञान बतावै ।
काल न लागै, संशय भागै, ज्यों है त्यों समझावै ॥ टेक ॥
अमर गुरु के आसन रहिये, परम ज्योति तहँ लहिये ।
परम तेज सो दृढ़ कर गहिये, गहिये लहिये रहिये ॥ १ ॥
मन पवना गहि आतम खेला, सहज शून्य घर मेला ।
अगम अगोचर आप अकेला, अकेला मेला खेला ॥ २ ॥
धरती अम्बर चंद न सूरा, सकल निरंतर पूरा ।
शब्द अनाहद बाजहिं तूरा, तूरा पूरा सूरा ॥ ३ ॥
अविचल अमर अभय पद दाता, तहाँ निरंजन राता ।
ज्ञान गुरु ले दादू माता, माता राता दाता ॥ ४ ॥
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव गुरु ज्ञान का परिचय दे रहे हैं कि हे जिज्ञासुओं ! हमारे परमेश्वर रूप गुरु ऐसा ज्ञान बताते हैं कि जिस ज्ञान को धारण करने से किसी प्रकार का काल आकर स्पर्श नहीं करता है और सम्पूर्ण संशय भी अन्तःकरण से भाग जाते हैं और जैसा शुद्ध स्वरूप है आपका, वैसा ही समझाकर कहते हैं । ऐसे ब्रह्म स्वरूप गुरुदेव के पास ही रहिये । उनके परदेश से जीव ब्रह्म की एकता रूप ज्ञान - ज्योति को सम्पादन करें । उस ज्ञान - ज्योति को दृढ़ निश्चय से ग्रहण करिये तो फिर परमेश्वर के शुद्ध स्वरूप को हृदय में लीजिये और उसी में स्थिर रहिये । मन और श्वास का निरोध करके ब्रह्मस्वरूप आत्मा का विचार रूपी खेल खेलिये । इस प्रकार निर्द्वन्द्व हृदय रूपी घर में ही मिलाप करिये ।
वहाँ वह ‘अगम’ मन इन्द्रियों का अविषय आप स्वयं शुद्ध स्वरूप स्थित है । वह आप ही अकेला ब्रह्मवेत्ता, मुक्तपुरुषों के साथ मिलकर एकता रूप खेल खेलता है । उसके स्वरूप में न धरती है, न आकाश है, न चन्द्रमा और सूर्य ही है । वह आप सबके अन्दर निरन्तर रूप से पूर्ण हो रहा है और वहाँ अनहद शब्दरूपी, अखण्ड बाजे बज रहे हैं । उस शब्द को कोई शूरवीर साधक श्रवण करते हैं । वह अपने अविचल, अमर, अभय पद को देने वाले दाता हैं । वहाँ उत्तम साधक, उस निरंजन स्वरूप में राते रत्त रहते हैं । इसी प्रकार गुरु का ज्ञान लेकर जो ‘माता’ = मस्त और ‘राता’ = रत्त रहता है, वह ही उत्तम मुमुक्षुओं को उपरोक्त ज्ञान का उपदेश देने वाला है ।
तस्मात्कैवल्यसिद्धयर्थ गुरुमेव भजेत् प्रिये ।
गुरुं विना न जानन्ति मूढ़ास्तत्परमं पदम् ॥ २४१ ॥
भिद्यते हृदयग्रंथिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि गुरोः दृष्टे परावरे ॥ २४१ ॥

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