शनिवार, 6 जून 2015

*शिष्य जैमल कछवाहा*

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-१)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज,
पुष्कर, राजस्थान ।*
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*~ त्रयोदश बिंदु ~*
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*शिष्य जैमल कछवाहा* - आमेर में कुछ दिन निवास करने पर दादूजी की सूचना इधर उधर जाने जाने लगी । बूंली ग्राम में सूचना मिली कि दादूजी आमेर पधार गये हैं । तब बूंली ग्राम के ठाकुर के पुत्र जैमल कछवाहा को लेकर उनकी माता आमेर को चल पड़ी । 
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जैमल के पिता का देहांत होने पर बालक पुत्र को लेकर माता पहले मुकुन्द भारती के पास गई थी, उन्होंने दादूजी को बताया था । वह कथा पहले आ गई है ।
माता का नाम "धनकुमारी' था - 
"बूंली ग्राम ढूंढार में, जैमल ठाकुर जास ।" 
"धन्य मात धनकुवरि को, जायो जैमल पूत ।"
(आत्मबिहारी) 
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वह अपने पुत्र को साथ लेकर आमेर नगर में आकर तथा दादूजी का पता पूछकर रामबाग में जाकर दादूजी का दर्शन करके अति हर्षित हुई और प्रसाद तथा चादर चढ़ाकर प्रणामादि कर के बैठ गई ।
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जैमल कछवाहा की माता से वार्ता - फिर हाथ जोड़कर बोली - भगवन् ! चिरकाल से आपके दर्शन की प्रतीक्षा कर रही थी, आज आपके दर्शन हुये हैं । दादूजी ने पूछा क्यों प्रतीक्षा कर रही थी ? माता बोली भगवन् ! मेरे इस पुत्र जैमल को लेकर मुकुन्द भारती जी के पास म्हार के पर्वत पर गई थी और प्रार्थना की थी - आप मेरे इस पुत्र को अपना शिष्य बना कर कृतार्थ करें । 
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तब उन्होंने कहा - "यह तो संत प्रवर दादूजी की आत्मा है । वे आमेर में आवें तब इस को उनका शिष्य बना देना । उनके संग से तीन कोटि प्राणियों का उद्धार होगा । वे सनकजी के अवतार हैं और परमात्मा की आज्ञा से लोक कल्याणार्थ ही दादूजी के रूप में प्रकट हुये हैं । अतः मैं मुकुन्द भारतीजी की आज्ञानुसार ही अब इस मेरे पुत्र जैमल को लेकर आप के पास आई हूँ । कृपा करके इस को शिष्य बनाइये । 
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माता की उक्त बातें सुनकर दादूजी ने कहा - मुकुन्द भारती सच्चे संत थे और मांडव्य ऋषि के अवतार थे, उन्होंने तीन कोटि के उद्धार की बात कही थी सो तो मेरे इस शरीर के रहते - रहते तीन कोटि का उद्धार होगा किंतु प्राणियों का उद्धार तप पीछे भी होता ही रहेगा । कारण ? जो परमेश्वर की इच्छा से मेरे इस शरीर के मुख से वाणी निकली है, वह वाणी संसार में जब तक रहेगी तब तक उसके विचारपूर्वक पढ़ने व सुननेवालों का उद्धार होता ही रहेगा । उस वाणी के द्वारा निर्गुण ब्रह्म भक्ति का प्रवाह सदा बहता ही रहेगा । 
(क्रमशः)

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